सोमवार, 20 जुलाई 2026

साथी जरनैल सिंह सांगवान की स्मृति सभा ।

साथी जरनैल सिंह सांगवान की स्मृति सभा । 

यमुनानगर जिले के गाँव तेजली निवासी जरनैल सिंह सांगवान ऐसे ही शख्स हैं जिन्हें याद करने के लिए हम एकत्रित हुए हैं। हममें से हर कोई अपने-अपने ढंग और कारणों से उनका नजदीकी है। उन्होंने अपने लगभग पाँच दशक के सक्रिय जीवन में ऐसी पहचान अर्जित की है कि हम सब उन्हें अपना खास मानते हैं। वे एक साधारण किसान परिवार में श्रीमती शांति देवी और श्री रामजीलाल के घर 8 सितम्बर 1950 को जन्मे तथा लगभग 76 वर्ष की आयु के साथ अपनी जीवन यात्रा पूरी करके चले गए। आमतौर पर स्वस्थ रहते थे लेकिन अब 7 जुलाई शाम को पेट दर्द शुरू हुआ और 9 जुलाई को दोपहर बाद चिरनिद्रा में चले गए।

 जरनैल सिंह ने प्राथमिक शिक्षा अपने गाँव तेजली की राजकीय प्राथमिक पाठशाला में की। सन् 1967 में एस डी हायर सेकेंडरी स्कूल जगाधरी से दसवीं की। सन् 1970 एम एल एन कॉलेज यमुनानगर से बी.एस.सी. उपाधि ली और 1972 में यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ एजूकेशन कुरुक्षेत्र से बी.एड. की। दिनांक 5 जून 1972 को वे राजकीय उच्च विद्यालय मांधना (मोरनी क्षेत्र) में छह माह आधार पर विज्ञान अध्यापक नियुक्त हो गए। सन् 2002 में मुख्याध्यापक पदोन्नत हो गए। वे 30 सितम्बर 2008 को प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हुए।

जरनैल सिंह सांगवान सन् 1985 में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में सक्रिय हुए थे।उसके बाद सन् 1987 के आन्दोलन के आते-आते वे अम्बाला-पंचकुला-यमुनानगर क्षेत्र में कर्मचारी और अध्यापक आन्दोलन का नामचीन चेहरा बन गए। उन्होंने जिला प्रधान से राज्य में प्रेस सचिव, उपप्रधान, वरिष्ठ उपप्रधान और राज्याध्यक्ष पद तक सेवाएं दी। सर्व कर्मचारी संघ में वे लगातार जिला अध्यक्ष रहे। सन् 1992 में सत्यपाल सिवाच को दुर्घटना में चोट लगने के बाद उन्हें केन्द्रीय कमेटी में मनोनीत किया गया। बाद में वे राज्य उपाध्यक्ष रहे।

जरनैल सिंह का वैचारिक सफर भी बहुत रोचक है। वे वैज्ञानिक स्वभाव के तो शुरू से ही रहे हैं। बाद में सन् 1991 में जब हरियाणा राज्य में साक्षरता अभियान चला तो वे कुरुक्षेत्र-अम्बाला-यमुनानगर- कैथल जिलों में लिटरेसी एंबेसडर रहे। जब अखिल भारतीय स्तर पर अध्यापकों को संगठित करने के लिए 1997 में चेन्नई में कन्वेंशन की तो उसमें भी ये हरियाणा के सात सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे। एसटीएफआई के स्थापना सम्मेलन में भी ये कोलकाता में प्रतिनिधि थे। जब सन् 2005 नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क बनाने के लिए एनसीईआरटी ने दो दिवसीय कार्यशाला कोझिकोड (केरल) में आयोजित की गई तो उसमें भी जरनैल सिंह हरियाणा के पाँच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे। वैचारिक दृष्टि से वे प्रगतिशील और जनवादी आन्दोलन से आगे बढ़कर मार्क्सवादी बन गए थे। उसी अग्रगामी सोच का प्रभाव रहा कि वे सेवानिवृत्ति के बाद वर्षों तक माकपा की जिला सांगठनिक कमेटी के सचिव रहे।

वे अपनी उम्र के अधिकतर साथियों से अधिक स्वस्थ और गतिशील रहे हैं। उन्हें सन् 2016 में जनशिक्षा अधिकार मंच हरियाणा का संयोजक बनाया गया। सन् 2012 से ही रिटायर्ड कर्मचारी संघ हरियाणा में भी सक्रिय रहे। श्री आर सी जग्गा की आकस्मिक मृत्यु के पश्चात् उन्हें कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया गया और अगले पानीपत अधिवेशन में अध्यक्ष बनाया गया। सन् 2020-21 में जब पूरे देश में ऐतिहासिक किसान आन्दोलन चला तो इन्होंने अखिल भारतीय किसान सभा की ओर से यमुनानगर और आसपास के क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका अदा की। वे भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के यमुनानगर जिला के सचिव भी रहे। गरीब वर्ग और मेहनतकश जनता के लिए उनकी पक्षधरता स्पष्ट रही। कभी भी जातिवादी अथवा साम्प्रदायिक प्रभावों के दबाव में नहीं आते थे। यमुनानगर में महिला, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक, कर्मचारी ,शिक्षक अथवा अन्य सामाजिक उत्पीड़न के मामले आते तो उसके विरोध के आन्दोलनों में जरनैल सिंह सदैव अगली कतार में मिलते थे।

वे मैदान के योद्धा थे। आन्दोलन के दौरान वे अनेक बार जेल और पुलिस हिरासत में रहे। सितंबर 1993 में अम्बाला जेल में ही कार्यकर्ता शिक्षण चलाया। बाद में उन्हें दिसम्बर में फिर से गिरफ्तार कर लिया। वे इस दौरान नौकरी से बर्खास्त होने वालों में शामिल थे। सन् 1998 में पूरी केन्द्रीय कमेटी गिरफ्तार की गई तब भी वे चार दिन हिसार जेल में रहे। इन्हें कई बार चार्जशीट किया गया। एक बार वर्ष भर निलंबित रहे। वे स्वभाव से ही बेखौफ थे। जटिल परिस्थिति में से रास्ता निकालने के लिए उनमें पर्याप्त साहस और धैर्य रहा । जो मौजूदा दौर के कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक हो सकता है।

जरनैल सिंह की जीवन यात्रा में आए अनेक उतार-चढ़ावों में परिवार का पूरा सहयोग रहा। उनकी जीवन साथी श्रीमती जिलेवंती कठिनाई के समय न केवल साथ खड़ी रही बल्कि अनेक मौकों पर प्रदर्शनों में स्वयं शामिल हुई। घर पर आने जाने वालों के आतिथ्य का अतिरिक्त काम तो उनके जिम्मे रहता ही था। उनके माता-पिता को भी बेटे के कार्यों से सदैव सहमति बनी रही। उनके तीनों छोटे भाई भी परामर्श लेकर ही चलते थे। जरनैल सिंह की बेटियों और बेटे नवीन सांगवान  भी अपने डैडी के मार्गदर्शन में ही काम करते रहे हैं।

आज इस स्मृति सभा में उपस्थित समस्त स्वजन, परिजन, रिश्तेदार, मित्र, शुभचिंतक और आन्दोलनों के साथी अपने अपने अनुभवों से उन्हें याद कर रहे हैं। वे अपने परिवार के साथ - साथ हम सबके बड़े परिवार का हिस्सा रहे हैं। हम सब उनकी स्मृति को संजोए रखते हुए उस परम्परा और कार्यों को पूरा करने के लिए स्वयं को संकल्पबद्ध करते हैं जो साथी जरनैल सिंह ने शुरू किए थे। सलाम साथी।

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