स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर दृष्टिकोण एवं कार्य योजना
सीपीआई(एम) प्रकाशन
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प्रस्तावना
मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा अपनाई गई नवउदारवादी नीतियों ने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक बाजारू वस्तु में बदलने की प्रक्रिया को तेज कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप एक शक्तिशाली चिकित्सा-औद्योगिक-वित्तीय गठजोड़ का निर्माण हुआ है। इस प्रक्रिया ने सार्वभौमिकता, सुलभता और समानता जैसे उन मूलभूत सिद्धांतों को लगातार कमजोर किया है, जो किसी लोकतांत्रिक और जनोन्मुखी स्वास्थ्य व्यवस्था की नींव होने चाहिए। स्वास्थ्य सेवा को राज्य की सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं, बल्कि मुनाफा कमाने और अधिशेष वसूल करने के क्षेत्र के रूप में देखा जा रहा है।
साथ ही, आरएसएस द्वारा प्रचारित मनुवादी, अंधविश्वासी और छद्म-वैज्ञानिक दृष्टिकोण ने स्वास्थ्य संबंधी विमर्श को और अधिक विकृत किया है। मूत्र और गोबर चिकित्सा, खाद्य संबंधी जड़ मान्यताओं तथा अन्य अवैज्ञानिक विश्वासों का प्रचार वैज्ञानिक सोच को कमजोर करता है और जाति, धर्म तथा अंधविश्वास के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार को बढ़ावा देता है। यह संविधान के मूल्यों और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के प्रत्यक्ष विरोध में है।
रोग किसी व्यक्ति के सामाजिक दर्जे, धर्म, जाति, भाषा या किसी अन्य सामाजिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं करता। इसलिए उपचार भी सार्वभौमिक, समान और पूरी तरह वैज्ञानिक तथा साक्ष्य-आधारित सिद्धांतों द्वारा निर्देशित होना चाहिए। किंतु वर्तमान कॉरपोरेट-सांप्रदायिक शासन के तहत स्वास्थ्य को केवल एक वस्तु में ही नहीं बदला गया है, बल्कि उसमें अंधविश्वास और मिथकीय तत्व भी शामिल कर दिए गए हैं, जिससे वह तर्क, विज्ञान और जनकल्याण से दूर होता जा रहा है।
ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे और उत्पीड़ित समुदायों को अत्यधिक आर्थिक अभाव तथा कार्यस्थलों और समाज में अनेक प्रकार के भेदभाव और शोषण का सामना करना पड़ता है। वर्ग, जाति, नस्ल, जातीयता, लिंग, जेंडर,
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यौनिकता, क्षमता और नागरिकता जैसे परस्पर जुडे सामाजिक आयाम, सत्ता संबंधों और संसाधनों के वितरण को निर्धारित करते हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था समाज में मौजूद सामाजिक-आर्थिक असमानताओं की अभिव्यक्ति है। चिकित्सा-औद्योगिक गठजोड, जो समाज के प्रभुत्वशाली वर्गों और चिकित्सा क्षेत्र के उन प्रभावशाली हिस्सों के साथ मिलकर काम करता है जिनका राज्य की नीतियों और संसाधनों पर व्यापक नियंत्रण है. यह सुनिश्चित करता है कि जनपक्षीय नीतियों का दायरा केवल उतना ही रहे. जितना बडे पंजीपति वर्ग के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक हो।
इस संदर्भ में स्वास्थ्य क्षेत्र हमारी पार्टी और जनसंगठनों के हस्तक्षेप का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है। हमारा कार्य केवल जनविरोधी स्वास्थ्य नीतियों से जनता पर पड़ने वाले भारी बोझ का प्रतिरोध करना और जहां तक संभव हो राहत एवं सहयोग प्रदान करना ही नहीं है, बल्कि आरएसएस तथा अन्य सांप्रदायिक शक्तियों के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करना भी है। विडंबना यह है कि स्वास्थ्य व्यवस्था के वर्तमान संकट के लिए जिम्मेदार यही शक्तियां चुनिंदा स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से अपने वैचारिक और संगठनात्मक प्रभाव का विस्तार करने का प्रयास कर रही हैं। इस खतरे की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक है कि हम स्वास्थ्य क्षेत्र में अपने हस्तक्षेपों को व्यापक रूप से मजबूत करें और उनका विस्तार करें।
स्वास्थ्य क्षेत्र की वर्तमान स्थिति
भारत का स्वास्थ्य क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है और गहरी संरचनात्मक सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से उत्पन्न गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने अपने 1948 के संविधान में स्वास्थ्य को, 'पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था तथा केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं' के रूप में परिभाषित किया था। स्वास्थ्य मूलतः एक राजनीतिक प्रश्न है, जिसे सामाजिक न्याय और राजनीतिक अर्थव्यवस्था की आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाना चाहिए, न कि केवल एक तकनीकी-चिकित्सीय समस्या के रूप में। अच्छा स्वास्थ्य केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर निर्भर नहीं करता, बल्कि आय, जाति, लिंग, भोजन और पोषण, जल और स्वच्छता, आवास और जीवन-पर्यावरण, पर्यावरणीय परिस्थितियां, व्यवसाय और
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कार्य दशाएं, शिक्षा तथा हिंसा और भेदभाव से मुक्ति जैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और पर्यावरणीय कारकों पर भी निर्भर करता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट, नवउदारवादी सुधार और निजीकरण
पिछले तीन से चार दशकों के नवउदारवादी सुधारों ने स्वास्थ्य संबंधी असमानताओं को और गहरा किया है, जो भाजपा/एनडीए शासन के दौरान और अधिक बढ़ गई हैं। 1980 के दशक से लागू संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रमों (स्ट्रक्चरल एडजस्टमेंट प्रोग्राम्स) ने सार्वजनिक व्यय और सब्सिडी में कटौती की, निजीकरण को बढ़ावा दिया और सार्वजनिक अवसंरचना को कमजोर किया।
वर्तमान में भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर निजी क्षेत्र का वर्चस्व है। देश की लगभग 80 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र द्वारा प्रदान की जाती हैं तथा लगभग 62 प्रतिशत अस्पताल निजी स्वामित्व में हैं। देश के कुल 69,000 अस्पतालों में से 43,486 निजी क्षेत्र में हैं। अस्पतालों के लगभग 63 प्रतिशत बिस्तर (10.18 लाख) निजी संस्थानों में हैं, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र में केवल 7.14 लाख बिस्तर उपलब्ध हैं।
पिछले दशक (2015-2023) में निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का तीव्र विस्तार हुआ है और इसमें 25.3 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर दर्ज की गई है, जो स्वास्थ्य सेवाओं के बढ़ते कॉरपोरेटीकरण और व्यावसायीकरण को दर्शाती है।
निजीकरण और कॉरपोरेटीकरण ने दो-स्तरीय स्वास्थ्य व्यवस्था को जन्म दिया है-एक ओर संपन्न, उच्च वर्ग और विदेशी मरीजों के लिए उन्नत चिकित्सा सेवाएं और दूसरी ओर आम जनता के लिए निम्नस्तरीय तथा अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं।
निजी मेडिकल कॉलेजों द्वारा अत्यधिक शुल्क वसूलने के कारण चिकित्सा शिक्षा भी एक वस्तु में बदल गई है। इससे अभिजात्यवाद को बढ़ावा मिला है और वंचित वर्गों का बहिष्कार हुआ है, जबकि नियामक निगरानी कमजोर पड़ गई है। कैपिटेशन फीस और कोचिंग संस्कृति के बढ़ते प्रभाव ने चिकित्सा शिक्षा को संपन्न वर्गों का विशेषाधिकार बना दिया है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं में समानता कमजोर हुई है।
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सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर किया जाना
निजीकरण को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की दवा निर्माण इकाइयों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया है। केरल को छोडकर लगभग सभी राज्य स्तरीय औषधि कंपनियां अस्तित्व के संकट का सामना कर रही हैं।
फार्मा सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयूज़) के कमजोर होने से दवाओं की कीमतें बढी हैं. जीवनरक्षक दवाओं तक पहुंच घटी है, नवाचार प्रभावित हुआ है तथा कच्चे माल और तैयार दवाओं के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बाहरी स्रोतों पर निर्भरता बढ़ी है।
नैदानिक परीक्षण (डायग्नोस्टिक टेस्ट) लगभग पूरी तरह एक कमजोर रूप से विनियमित निजी क्षेत्र के हाथों में हैं, जहां वास्तविक आवश्यकता के बजाय भ्रष्ट रेफरल नेटवर्क और बाजार-आधारित प्रचार का प्रभाव अधिक है।
दवाओं का संकट
दवाओं की कीमतों में लगातार वृद्धि हुई है और केवल 18 प्रतिशत दवाएं ही मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं। लोगों द्वारा अपनी जेब से किए जाने वाले स्वास्थ्य व्यय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है।
बाजार में उपलब्ध दवाओं में 40 प्रतिशत से अधिक तथाकथित "फिक्स्ड ड्रग कॉम्बिनेशन" हैं, जिनमें से अनेक अवैज्ञानिक, महंगी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं।
नए बौद्धिक संपदा (आइपी) नियमों ने भारत की उस पूर्व प्रक्रिया-आधारित व्यवस्था का स्थान ले लिया है, जिसने जीवनरक्षक दवाओं को अधिक सुलभ और सस्ता बनाया था। यूपीए-1 के दौरान पार्टी के हस्तक्षेप और आग्रह से संशोधित किए गए भारतीय पेटेंट कानूनों पर आज भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विकसित पूंजीवादी देशों का दबाव बना हुआ है।
फार्मास्यूटिकल कंपनियों और सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों के बीच गठजोड़, जिसे 30 दवा कंपनियों द्वारा 900 करोड़ रुपये से अधिक के इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने के माध्यम से बल मिला, सार्वजनिक जवाबदेही को कमजोर करता है।
हर वर्ष 2000 करोड़ रुपये से अधिक के औषधि विज्ञापन दवाओं की कीमतों को और बढ़ाते हैं।
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बीमा-आधारित योजनाएं और कॉरपोरेट विस्तार
भाजपा सरकार के दौरान निजी स्वास्थ्य क्षेत्र का विस्तार और तेज हुआ है तथा बड़े कॉरपोरेट अस्पताल समूहों का एकाधिकार बढ़ा है।
हाल के वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय निजी इक्विटी कंपनियों (जैस केकेआर, ब्लैकस्टोन और टीपीजी ग्रोथ) ने देशभर के अस्पताल समूहों में हिस्सेदारी खरीदी है। उनका उद्देश्य स्पष्ट रूप से जनता के हितों के बजाय मुनाफा कमाना है।
कॉरपोरेट अस्पतालों द्वारा अत्यधिक शुल्क वसूली जारी है, जबकि पर्याप्त नियमन का अभाव है।
पीएम-जेएवाई जैसी योजनाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को मजबूत करने के बजाय बीमा-आधारित वित्तपोषण को प्राथमिकता देती हैं। इससे मरीजों को सीमित वित्तीय सुरक्षा मिलती है, जबकि निजी स्वास्थ्य प्रदाताओं को अधिक लाभहोता है।
इन योजनाओं का लाभ अपेक्षाकृत संपन्न वर्गों तक अधिक पहुंचता है, जिससे प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए उपलब्ध संसाधन कम हो जाते हैं।
मुनाफा-केन्द्रित मॉडल अनावश्यक जांचों और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं को
बढ़ावा देते हैं, जिससे लोगों का निजी स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है और स्वास्थ्यकर्मियों का शोषण भी होता है।
भारत के कॉरपोरेट स्वास्थ्य क्षेत्र में वित्तीय बाजारों, निवेश कंपनियों और सट्टा पूंजी की बढ़ती भागीदारी एक अत्यंत चिंताजनक प्रवृत्ति है। इन निवेश स्त्रोतों का आधार अक्सर विदेशों के संदिग्ध टैक्स हैवन क्षेत्रों में होता है, जिससे उनका
नियमन कठिन हो जाता है।
भाजपा/एनडीए शासन के दौरान कॉरपोरेट अस्पतालों, डायग्नोस्टिक केन्द्रों और संबंधित चिकित्सा सुविधाओं में स्वचालित मार्ग (ऑटोमैटिक रूट) के तहत 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की अनुमति दी गई है।
अल्पकालिक लाभ के उद्देश्य से संचालित यह वित्तीयकरण स्वास्थ्य सेवाओं को पूरी तरह मुनाफा-प्रधान उद्योग में बदल रहा है, जिसके समाज पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं। इससे चिकित्सा पेशे की नैतिकता कमजोर होती और स्वास्थ्यकर्मियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
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कॉरपोरेट अस्पतालों में कार्यरत अनेक चिकित्सकों ने राजस्व लक्ष्य पूरे करने के लिए डाले जाने वाले भारी दबाव की शिकायत की है, जिसके कारण कई बार चिकित्सकीय निर्णय, आर्थिक लाभ के पक्ष में प्रभावित होते हैं।
वित्तीयकरण और कॉरपोरेटीकरण स्वास्थ्य सेवा के सामाजिक चरित्र को कमजोर कर देते हैं। इससे स्वास्थ्य सेवा अपने सामाजिक दायित्व से दूर हो जाती है. स्वास्थ्यकर्मी मात्र अदला-बदली योग्य श्रमिक बनकर रह जाते हैं और मरीजों को देखभाल की आवश्यकता वाले इंसानों के बजाय केवल आय के स्रोत के रूप में देखा जाने लगता है।
सार्वजनिक वित्तपोषण का संकट
भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय अत्यंत निम्न स्तर पर बना हुआ है। भारत स्वास्थ्य क्षेत्र पर अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.5 प्रतिशत से भी कम खर्च करता है। तुलना के लिए, थाईलैंड भारत की अपेक्षा लगभग 10 गुना और चीन लगभग 15 गुना अधिक खर्च करता है।
सार्वजनिक निवेश की यह दीर्घकालिक कमी लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी जेब से खर्च (आउट आफ पॉकिट एक्सपेंडीचर) करने के लिए मजबूर करती है। अत्यधिक स्वास्थ्य व्यय के कारण प्रतिवर्ष 5.5 करोड़ से अधिक लोग गरीबी में धकेल दिए जाते हैं। भारत में कुल स्वास्थ्य व्यय का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा लोगों द्वारा अपनी जेब से वहन किया जाता है, जिससे करोड़ों लोगों के लिए उपचार वहन करना कठिन हो जाता है।
केंद्रीकरण
जैसा कि सर्वविदित है, भाजपा सरकार के कार्यकाल में संघीय ढांचे की कीमत पर केंद्र सरकार द्वारा शक्तियों, योजनाओं और वित्तीय संसाधनों का केंद्रीकरण एक गंभीर समस्या बन गया है। संविधान की राज्य सूची (सूची-2) के अंतर्गत राज्यों की जो वैधानिक भूमिका है, उसे भी कमजोर किया जा रहा है। इसका स्वास्थ्य क्षेत्र पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
केंद्र सरकार आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाइ) तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) जैसी योजनाओं के मानदंड तय करती है और धनराशि के वितरण को नियंत्रित करती है। इससे संघीय
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व्यवस्था कमजोर होती है, जिसका केरल जैसे राज्य विरोध कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप राज्यों को मिलने वाले वित्तीय संसाधनों में कमी आती है तथा राज्यों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुरूप स्वास्थ्य योजनाएं बनाने की क्षमता प्रभावित होती है।
इसके अतिरिक्त, इससे सभी राज्यों पर एक जैसी स्वास्थ्य नीतियां लागू करने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जबकि स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार राज्य-विशिष्ट दृष्टिकोण आवश्यक हैं। उदाहरण के लिए, केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में स्वास्थ्य सूचकांक और अवसंरचना अपेक्षाकृत उन्नत हैं। इसलिए स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए राज्यों को अधिक अधिकार और संसाधनों का हस्तांतरण अत्यंत आवश्यक है।
राज्यों में स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति
नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक के अनुसार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले राज्यों में केरल, पंजाब, तमिलनाडु और मिजोरम शामिल हैं।
सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, नागालैंड, राजस्थान, बिहार, हरियाणा, ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड शामिल हैं।
अन्य सभी राज्य स्वास्थ्य संकेतकों और प्रदर्शन के आधार पर मध्यम श्रेणी में आते हैं।
यद्यपि राज्यों के बीच कुछ भिन्नताएं हैं, फिर भी पूरे देश के स्तर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना या तो ठहराव की स्थिति में है या लगातार कमजोर हो रही है, जबकि निजी स्वास्थ्य क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि आम जनता की गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच कम होती जा रही है। अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं आम लोगों की पहुंच से लगातार बाहर होती जा रही हैं और मुख्यतः संपन्न वर्गों तक सीमित होती जा रही हैं।
वर्तमान स्वास्थ्य संकट और संरचनात्मक असमानताएं
समय के साथ कुछ प्रगति के बावजूद भारत के स्वास्थ्य संकेतक अब भी गंभीर रूप से चिंताजनक हैं।
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भारत में मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 145 है, जो श्रीलंका (36) और चीन (29) की तुलना में काफी अधिक है।
पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु विश्व स्तर पर होने वाली कुल मौतों के 20 प्रतिशत से अधिक के लिए जिम्मेदार है, जो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य व्यवस्था की गंभीर विफलताओं को दर्शाती है।
क्षेत्रीय असमानताएं, शासन और राजनीतिक इच्छाशक्ति की भूमिका को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं। केरल में शिशु मृत्यु दर प्रति 1000 जीवित जन्मों पर 5 है, जबकि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश में यह 37 है।
छत्तीसगढ़ के अनुसूचित जनजाति समुदायों में शिशु मृत्यु दर 58 तक पहुंच जाती है, जबकि केरल की सामान्य जातियों में यह केवल 3 है।
सी-सेक्शन (सिजेरियन) प्रसव की दर भी अत्यधिक असमान है- शहरी
श्रीनगर में प्रति 100 प्रसवों पर 75, जबकि छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में केवल
वामपंथी शासन वाले राज्यों (जैसे केरल) तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को प्राथमिकता देने वाले राज्यों (जैसे तमिलनाडु) में अपेक्षाकृत बेहतर परिणाम देखने को मिलते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि शासन की राजनीतिक दिशा स्वास्थ्य परिणामों को प्रभावित करती है।
अवसंरचना और मानव संसाधन संकट
सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान लंबे समय से संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। उप-केंद्रों (सब-सेंटर्स), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसीज़) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसीज़) में 20 से 30 प्रतिशत तक की कमी है। इसके साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी और शहरी क्षेत्रों की ओर झुकाव भी मौजूद हैं।
भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों के अनुसार देश को अभी भी कम-से-कम 25,000 अतिरिक्त उप-केंद्र, 5,000 अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 2,000 अतिरिक्त सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की आवश्यकता है।
देश के अनेक जिलों में पूर्ण रूप से कार्यशील जिला अस्पताल नहीं हैं और उनमें से कई का निजीकरण किया जा रहा है या उन्हें सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल में बदला जा रहा है।
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सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली आशा (एएसएचए) कार्यकर्ता और अन्य अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मी असुरक्षित रोजगार, कम वेतन और शोषणपूर्ण कार्य परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं।
संवेदनशील आबादी और प्रणालीगत बहिष्करण
पूंजीवादी व्यवस्था श्रमिकों को कम और जीवन-निर्वाह स्तर से नीचे मजदूरी देने के लिए, महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक सामाजिक पुनरुत्पादन कार्य पर अत्यधिक निर्भर रहती है।
स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं में कल्याणकारी राज्य की भूमिका ने, सामाजिक पुनरुत्पादन के बोझ को साझा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था, जिससे महिलाओं के लिए श्रम शक्ति में शामिल होना संभव हुआ और सामाजिक प्रगति तथा आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला।
किन्तु कल्याणकारी राज्य की भूमिका में कमी और स्वास्थ्य तथा देखभाल क्षेत्र के बाजारीकरण ने यह जिम्मेदारी पुनः परिवारों, विशेषकर महिलाओं, पर डाल दी है, जिसके कारण उन पर कार्य का बहुआयामी बोझ बढ़ गया है।
लैंगिक और प्रजनन स्वास्थ्य असमानताएं
लैंगिक और प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी असमानताएं विशेष रूप से गंभीर हैं।
महिलाएं, चीयर, इंटरसेक्स, ट्रांस और अन्य लैंगिक विविधता वाले व्यक्ति, साथ ही दिव्यांगजन, व्यापक भेदभाव, हिंसा, सामाजिक कलंक और आवश्यक सेवाओं से वंचित किए जाने का सामना करते हैं।
दिव्यांग महिलाओं और लड़कियों के साथ हिंसा होने की संभावना अन्य महिलाओं की तुलना में 2 से 4 गुना अधिक होती है। वहीं शारीरिक, कानूनी, संचार संबंधी और सामाजिक बाधाओं के कारण शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्थाएं भी उनके लिए सुलभ नहीं होती हैं। जब किसी व्यक्ति की अनेक पहचानें (जैसे जाति, लिंग, दिव्यांगता आदि) एक साथ जुड़ती हैं, तो ये समस्याएं और अधिक गंभीर हो जाती हैं।
जाति आधारित भेदभाव और स्वास्थ्य
जाति आधारित सामाजिक विभाजन आज भी सफाई, कचरा प्रबंधन और मैला ढोने जैसे कार्यों को मुख्यतः दलितों और अन्य कमजोर समुदायों पर थोपता है।
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ऐसे कार्य आज भी सम्मानहीन, कम वेतन वाले, असुरक्षित और सामाजिक मान्यता से वंचित हैं, जिससे इन समुदायों पर बीमारी और यहां तक कि जीवन के लिए खतरे का जोखिम अधिक रहता है।
विभिन्न उद्योगों में व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिम आज भी श्रमिकों, विशेषकर हाशिये पर स्थित और निम्न आय वर्ग के लोगों को प्रभावित करते हैं। सरकार और कॉरपोरेट क्षेत्र द्वारा इन समस्याओं पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है।
शहरी झुग्गियों, ग्रामीण दलित बस्तियों और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की उपेक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के व्यावसायीकरण का सबसे अधिक दुष्प्रभाव शहरी एवं ग्रामीण गरीबों तथा निम्न-मध्यम वर्ग पर पड़ता है।
बहिष्कार और भेदभाव के ये रूप केवल अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि वे गहरी संरचनात्मक असमानताओं का प्रतिबिंब हैं, जो लिंग, जाति, दिव्यांगता, यौनिकता और समाज में जड़ जमाए हुए पदानुक्रमों से निर्मित होती हैं।
अन्य समकालीन मुद्दे
जलवायु परिवर्तन और उभरते स्वास्थ्य खतरे
जलवायु परिवर्तन पहले से मौजूद स्वास्थ्य संबंधी कमजोरियों को और अधिक गंभीर बना रहा है। भारत की 56 प्रतिशत से अधिक आबादी जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न उच्च स्वास्थ्य जोखिमों का सामना कर रही है।
कुपोषण, जल की कमी, जल की खराब गुणवत्ता, वायु प्रदूषण तथा अत्यधिक
गर्मी से संबंधित बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। इनका सबसे अधिक प्रभाव श्रमिकों, विशेषकर खुले में काम करने वाले श्रमिकों, शिशुओं, बुजुर्गों, दिव्यांगजनों, बेघर आबादी और अन्य हाशिये पर स्थित समुदायों पर पड़ता है।
दीर्घकालिक गैर-संचारी रोगों (नॉन-कम्युनिकेबल डिसीज़ेस-एनसीडीज़) में भी तेजी से वृद्धि हो रही है, जिससे पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सरकारी उपाय अब भी अपर्याप्त हैं। वाहक जनित रोग (वेक्टर-बॉर्न डिसीज़)
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बढ़ रहे हैं और जलवायु परिवर्तन के कारण इनके और अधिक बढ़ने की आशंका है। इससे अधिक सतर्कता और प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया की आवश्यकता उत्पन्न होती है।
स्वास्थ्य डेटा और अधिनायकवादी शासन
स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े निर्णयों को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं. लेकिन डेटा संग्रह की प्रक्रियाएं और प्रणालियां निजता के हनन, राज्य के अत्यधिक नियंत्रण, व्यक्तिगत सूचनाओं के व्यावसायीकरण, कॉरपोरेट एकाधिकार तथा व्यक्तिगत अधिकारों के दमन का खतरा भी पैदा करती हैं।
कोविड महामारी के दौरान मिले अनुभवों ने यह उजागर किया कि किस प्रकार डेटा प्रणालियां कमजोर की जा रही हैं, पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाणों के बिना स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लिए जा रहे हैं और आंकड़ों का चयनात्मक उपयोग विशेष हितों की पूर्ति के लिए किया जा रहा है।
भाजपा सरकारों द्वारा आंकड़ों में हेरफेर अभूतपूर्व स्तर तक पहुंचा दिया गया है। सरकारी तथा स्वायत्त संस्थाओं पर राजनीतिक आख्यानों के अनुरूप आंकड़े बदलने का दबाव डाला जाता है। साथ ही, ऐसे अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों और तुलनात्मक रैंकिंगों को चुनौती दी जाती है, जो सरकार के लिए असुविधाजनक या शर्मिंदगी का कारण बन सकते हैं।
दशकीय जनगणना कराने में जानबूझकर और असामान्य विलंब तथा नमूना सर्वेक्षणों के परिणामों में अनावश्यक हस्तक्षेप इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
सांप्रदायिकता और छद्म-विज्ञान
कॉरपोरेट-सांप्रदायिक गठजोड़ द्वारा लोकतंत्र पर सुनियोजित हमला किया जा रहा है और स्वास्थ्य क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा है।
अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेवाओं और औषधि क्षेत्र पर कॉरपोरेट नियंत्रण के अलावा, धार्मिक अल्पसंख्यकों और कमजोर वर्गों के विरुद्ध लक्षित हिंसा भी जारी है। इसके साथ ही स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय स्वास्थ्य संस्थानों का नाम बदलकर "आरोग्य मंदिर" रखा जा रहा है तथा छद्म-वैज्ञानिक मान्यताओं और उपचारों का प्रचार करके हिंदुत्ववाद विचारधारा को मजबूत किया जा रहा है।
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इसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। कोविड महामारी के दौरान दीप जलाने और थाली-ताली बजाने के अभियानों को बढ़ावा दिया गया तथा यह दावा किया गया कि नासा ने इन उपायों की प्रभावशीलता को प्रमाणित किया है।
इसी प्रकार, तथाकथित "पारंपरिक" या " भारतीय ज्ञान प्रणाली" (आइकेएस) के नाम पर कोरोनिल जैसी अप्रमाणित दवाओं से गंभीर बीमारियों के उपचार के झूठे दावे किए गए। कॉरपोरेट समर्थित तथाकथित "गॉडमैन" द्वारा किए गए इन दावों के विरुद्ध तब भी नियामक एजेंसियों ने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की, जब सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें फटकार लगाई।
जादुई उपचारों (मेजिकल रिमेडीज़) के विरुद्ध बने कानून को और अधिक सशक्त बनाया जाना चाहिए।
गौमूत्र आधारित उत्पादों के प्रचार तथा अंडों को मध्याह्न भोजन योजना से हटाने जैसी नीतियों सहित शाकाहार के आक्रामक, यहां तक कि हिंसक प्रचार के माध्यम से हिंदुत्व की एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) सहित विभिन्न माध्यमों से छद्म-वैज्ञानिक अनुसंधान को भी पर्याप्त सरकारी वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।
इन प्रवृत्तियों का मुकाबला मजबूत, वैज्ञानिक तथा साक्ष्य-आधारित जन अभियानों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
विशिष्ट स्वास्थ्य चुनौतियां
मानसिक स्वास्थ्य
वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य को अत्यंत कम महत्व दिया जा रहा है।
इस क्षेत्र में व्यापक निदान और उपचार, परिवार एवं समुदाय आधारित देखभाल तथा जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के विस्तार की आवश्यकता है। इन कार्यक्रमों को बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों, महिलाओं, स्वास्थ्यकर्मियों तथा किसानों और निम्न आय वर्ग के श्रमिकों जैसे संवेदनशील समूहों की विशेष समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए।
सभी स्तरों पर स्वास्थ्यकर्मियों और स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण
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की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।
प्रमुख रोग
एचआइवी-एड्स, पोलियो, तपेदिक (टीबी) और कुष्ठ रोग जैसी प्रमुख बीमारियों के लिए विस्तारित तथा पुनर्गठित कार्यक्रमों की आवश्यकता है। इनके लिए अधिक सतर्कता, पर्याप्त पोषण तथा उचित औषधीय उपचार पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए।
देश के भीतर बड़े पैमाने पर होने वाला प्रवास भी स्वास्थ्य क्षेत्र पर अतिरिक्त बोझ डालता है और नई चुनौतियां उत्पन्न करता है।
दिव्यांगजन
दिव्यांग व्यक्तियों के स्वास्थ्य अधिकारों की रक्षा और उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, अधिक ध्यान और संसाधनों की आवश्यकता है।
पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियां और औषधियां
भाजपा शासन के दौरान आयुष (एवाइयूएसएच) स्वास्थ्य प्रणालियों को लेकर काफी भ्रम की स्थिति पैदा हुई है। सरकार "भारतीय ज्ञान प्रणाली" (आइकेएस) के नाम पर अपरीक्षित और वैज्ञानिक रूप से सत्यापित न किए गए तथाकथित आयुर्वेदिक उपचारों और औषधियों को बढ़ावा दे रही है।
यहां तक कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था, जिसमें शल्य चिकित्सा (सर्जरी) भी शामिल है, में आयुर्वेदिक चिकित्सकों की भूमिका बढ़ाने का प्रयास किया गया है, जिसका चिकित्सा समुदाय ने उचित रूप से विरोध किया है।
साथ ही, पार्टी और जनसंगठनों के भीतर भी पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों और औषधियों की भूमिका तथा उनके प्रति अपनाए जाने वाले दृष्टिकोण को लेकर अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है।
अधिकांश पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां और उपचार सदियों के अनुभव और प्रयोगों के आधार पर विकसित हुए हैं। इनमें से कुछ उपचारों की प्रभावशीलता के पक्ष में अनुभवजन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं।
देश की बड़ी आबादी इन पारंपरिक प्रणालियों का उपयोग करती है और कुछ राज्यों में इनकी मजबूत सामाजिक स्वीकृति है।
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) भी 'पारंपरिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा (टीसीआइएम) को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में समाहित करने को बढ़ावा देता है तथा 170 से अधिक सदस्य देशों में इसके व्यापक उपयोग को स्वीकार करता है।' डब्ल्यूएचओ इसके लिए 'प्रमाण, सुरक्षा, गुणवत्ता और सांस्कृतिक सम्मान' पर विशेष बल देता है।
चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देशों में आधुनिक चिकित्सा के साथ-साथ पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के व्यापक उपयोग के अनुभवों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
पार्टी और जनसंगठनों के भीतर पारंपरिक स्वास्थ्य प्रणालियों के प्रति दृष्टिकोण और उनकी भूमिका पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपचारों के वैज्ञानिक सत्यापन, नियामक स्वीकृति और गुणवत्ता मानकों का पालन हो। आधुनिक निदान प्रणालियों तथा विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों के संयुक्त विशेषज्ञ बोर्डों की व्यवस्था भी होनी चाहिए, ताकि गलत निदान और गलत उपचार की संभावना को रोका जा सके।
सामाजिक और डिजिटल मीडिया का प्रभाव
सामाजिक एवं डिजिटल मीडिया- जैसे यूट्यूब पर परामर्श (काउंसलिंग) चैनल, वेलनेस सेंटर, जिम और फिटनेस उद्योग, झोलाछाप चिकित्सा पद्धतियां तथा जंक फूड का आक्रामक प्रसार का बढ़ता प्रभाव, गंभीर अध्ययन और आलोचनात्मक विश्लेषण की मांग करता है। विशेष रूप से इनके जनस्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और लोगों की स्वास्थ्य संबंधी धारणाओं पर पडने वाले प्रभावों को समझना और जनता के बीच स्पष्ट करना आवश्यक है।
कानूनी और नैतिक प्रश्न जिनकी सावधानीपूर्वक समझ आवश्यक है
सरोगेसी, विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों का सह-अस्तित्व, इच्छामृत्यु (असिस्टेड डैथ) तथा उनसे जुड़े नैतिक प्रश्नों जैसे मुद्दों पर सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। इन विषयों पर हमारा दृष्टिकोण संतुलित, तर्कसंगत तथा वैज्ञानिक समझ, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक न्याय पर आधारित होना चाहिए। न तो इनका अंध-समर्थन किया जाना चाहिए और न ही कट्टरतापूर्ण ढंग से अस्वीकार किया जाना चाहिए।
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नशीले पदार्थों, मादक द्रव्यों और शराब का दुरुपयोग
भारत भर में किशोरों और युवाओं के बीच शराब, तंबाकू, गांजा, ओपिओइड तथा नए प्रकार के सिंथेटिक नशीले पदार्थों का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है। यह प्रवृत्ति ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में दिखाई दे रही है तथा पहले से मौजूद सामाजिक और आर्थिक असुरक्षाओं को और गहरा कर रही है।
जनस्वास्थ्य के दृष्टिकोण से यह केवल व्यक्तिगत "लत" का प्रश्न नहीं है, बल्कि बेरोजगारी, अस्थिर रोजगार, लैंगिक तनाव, अभिभावकीय दबाव, शहरीकरण, संघर्षपूर्ण परिस्थितियों तथा आक्रामक विपणन जैसी परिस्थितियों का परिणाम है, जो कमजोर सार्वजनिक मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और सीमित तथा कलंकित नशामुक्ति सेवाओं के साथ मिलकर, पहले से ही वंचित समुदायों और परिवारों पर अतिरिक्त बोझ डालती हैं। इस समस्या के समाधान के लिए पीड़ितों के प्रति सहानुभूति रखते हुए, लेकिन इस सामाजिक बुराई का दृढ़ता से विरोध करते हुए, सावधानीपूर्वक सामाजिक पहल विकसित की जानी चाहिए।
बढ़ता मोटापा, तनाव, चिंता और अवसाद बच्चों और युवाओं के बीच गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में उभर रहे हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट तथा नकली और घटिया दवाओं का प्रसार भी लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा
है।
जनोन्मुखी विकल्पों की ओर
स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाएं मौलिक अधिकार हैं, कोई माल (कमोडिटी) नहीं। स्वास्थ्य सेवाएं आय, क्षेत्र, धर्म, जाति या लिंग की परवाह किए बिना सभी के लिए उपलब्ध, सुलभ और किफायती होनी चाहिए। इसके लिए सार्वभौमिक, व्यापक और निःशुल्क स्वास्थ्य सेवा की गारंटी देने वाला कानून तथा स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम 5 प्रतिशत वार्षिक सार्वजनिक व्यय सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत और सक्षम बनाया जाए ताकि उच्च गुणवत्ता के साथ निःशुल्क, व्यापक स्वास्थ्य सेवाएं, आवश्यक दवाएं और जांच सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। इसके लिए स्वास्थ्य संस्थानों का उन्नयन, पर्याप्त मानव संसाधन और बेहतर प्रशासनिक व्यवस्था आवश्यक हैं। तमिलनाडु, केरल और राजस्थान जैसे राज्यों के सफल मॉडलों के
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आधार पर आवश्यक दवाओं और जांच सुविधाओं तक देशव्यापी पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। जहां आवश्यक हो, वहां सक्षम कर्मचारियों, पारदर्शिता और जवाबदेही से युक्त स्वायत्त सार्वजनिक निगम स्थापित किए जाएं। दवाओं के लिए बजटीय आवंटन में उल्लेखनीय वृद्धि की जाए।
लोगों के प्रत्यक्ष (आउट ऑफ पॉकेट) स्वास्थ्य खर्च को कम किया जाए ताकि गरीबी और ऋणग्रस्तता को रोका जा सके। राष्ट्रीय लक्ष्य यह होना चाहिए कि कुल स्वास्थ्य व्यय में प्रत्यक्ष खर्च की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत से कम हो।
विविध पारिस्थितिकीय, सामाजिक-सांस्कृतिक तथा स्वास्थ्य संबंधी परिस्थितियों के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्य विशिष्ट, जन केंद्रित और विकेन्द्रीकृत प्रशासन आवश्यक है। समुदाय आधारित स्वास्थ्य प्रशासन के लिए स्थानीय निकायों की सक्रिय भागीदारी, प्रभावी निगरानी और शिकायत निवारण व्यवस्था तथा प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों का अधिक विकेन्द्रीकरण आवश्यक हैं। इसके साथ ही पारदर्शिता, सामाजिक जवाबदेही, जनभागीदारी और भ्रष्टाचार उन्मूलन को भी सुनिश्चित करना होगा।
स्वास्थ्यकर्मियों की गरिमा और विनियमन
एक सुशिक्षित, पर्याप्त वेतन प्राप्त तथा सम्मानजनक कार्य परिस्थितियों वाला स्वास्थ्य कार्यबल अत्यंत आवश्यक है। आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को नियमित किया जाए, संविदा नियुक्तियों के स्थान पर स्थायी नियुक्तियां की जाएं तथा स्वास्थ्य व्यवस्था के सभी स्तरों पर सार्वजनिक चिकित्सा शिक्षा का विस्तार किया जाए। ग्रामीण, शहरी, आदिवासी, संघर्षग्रस्त और दूरदराज क्षेत्रों में पर्याप्त स्वास्थ्यकर्मियों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। निजी स्वास्थ्य संस्थानों का कड़े कानूनों, जैसे सशक्त क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, के माध्यम से प्रभावी विनियमन किया जाए। पीपीपी के नाम पर होने वाले छिपे निजीकरण को समाप्त किया जाए, दवाओं की मूल्य निर्धारण प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए तथा अनैतिक प्रथाओं पर रोक लगाई जाए।
जलवायु परिवर्तन और सामाजिक निर्धारकों से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने के लिए सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), समेकित बाल विकास सेवा (आइसीडीएस), और मध्याह्न भोजन योजना को मजबूत किया जाए। साथ ही महिलाओं, दिव्यांगों और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील देखभाल
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सुनिश्चित की जाए तथा हिंसा और भेदभाव का मुकाबला किया जाए। इसमें टिकाऊ अवसंरचना, स्वच्छ ऊर्जा में निवेश और आपदा तैयारी शामिल होनी चाहिए। जलवायु नीति और स्वास्थ्य नीति का एकीकरण कर जलवायु-लचीली प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं तथा स्थानीय अनुकूलन रणनीतियां विकसित की जानी चाहिए, जिसके लिए स्वास्थ्य, पर्यावरण, कृषि, आपदा प्रबंधन और विकास अवसंरचना क्षेत्रों के बीच समन्वय आवश्यक है।
रणनीतिक कार्य
मदुरै कांग्रेस के राजनीतिक प्रस्ताव के पैरा 2.46 और 2.47, स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार के लिए संघर्ष, स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण और व्यवसायीकरण को पलटने तथा लोकतांत्रिक, सार्वजनिक वित्तपोषित और सार्वजनिक रूप से संचालित स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के व्यापक कार्यों की आधारशिला रखते हैं। ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था जो जनता, विशेषकर गरीबों की सेवा करे और समानता, सामाजिक न्याय, शोषण तथा भेदभाव से मुक्ति के सिद्धांतों पर आधारित हो।
निम्नलिखित प्राथमिक मुद्दों पर पार्टी साथियों, पार्टी शाखाओं एवं इकाइयों तथा पार्टी से जुड़े जनसंगठनों को विशेष ध्यान देना होगा।
हमारी मांगें
1. स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी जाए
स्वास्थ्य को एक मौलिक सार्वजनिक अधिकार के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाया जाए। सार्वजनिक वित्तपोषित और सार्वजनिक रूप से संचालित स्वास्थ्य व्यवस्था को सभी स्तरों पर मजबूत किया जाए। पर्याप्त संख्या में कर्मचारियों और संसाधनों से युक्त उप-स्वास्थ्य केन्द्रों (एससीज), प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसीज़) और सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों (सीएचसीज) का विस्तार किया जाए। सभी पीएचसीज़ में पूर्ण स्टाफ, आधारभूत संरचना और सेवाएं सुनिश्चित की जाएं। केंद्र सरकार स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के कम से कम 5 प्रतिशत तक बढ़ाए।
2. स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण और व्यवसायीकरण का विरोध स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण और व्यवसायीकरण का विरोध किया जाए।
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स्वास्थ्य क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को वापस लिया जाए तथा निजी और कॉरपोरेट अस्पतालों की फीस एवं शुल्कों का कड़ा नियमन किया जाए। बीमा-आधारित योजनाओं का उपयोग केवल पूरक उपाय के रूप में किया जाए, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिकता देते हुए उन्हें मजबूत किया जाए।
3. आंगनवाड़ी (आइसीडीएस), मध्याह्न भोजन और आशा योजनाओं को मजबूत किया जाए
आंगनवाड़ी (आइसीडीएस), मध्याह्न भोजन और आशा योजनाओं को सुदृढ़ किया जाए। आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं (दुष्टष्ठरु कर्मचारियों) तथा अन्य सभी स्वास्थ्यकर्मियों की पर्याप्त भर्ती, नियमितीकरण, उचित वेतन और प्रशिक्षण के लिए अभियान चलाया जाए।
4. दवाओं और टीकों के सार्वजनिक क्षेत्र उत्पादन का पुनर्जीवन
टीकों, आवश्यक दवाओं और उनके मध्यवर्ती उत्पादों के सार्वजनिक क्षेत्र उत्पादन को पुनर्जीवित किया जाए। आवश्यक दवाओं तक समान पहुंच और आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिए, आवश्यकतानुसार अनिवार्य लाइसेंसिंग लागू की जाए।
5. सभी के लिए सस्ती दवाएं सुनिश्चित की जाएं
कड़े नियमन और मूल्य नियंत्रण के माध्यम से दवाओं की कीमतें कम करने के लिए संघर्ष किया जाए। कुछ राज्यों में सफलतापूर्वक लागू की गई निःशुल्क दवा योजनाओं को सार्वभौमिक बनाने के लिए अभियान चलाया जाए।
6. खाद्य सुरक्षा और पोषण को मजबूत किया जाए
सार्वभौमिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए अभियान चलाया जाए जिसमें दालें और खाद्य तेल भी शामिल हों। केरल जैसे प्रगतिशील मॉडलों को सामने रखा जाए। मध्याह्न भोजन और आइसीडीएस पोषण सेवाओं की गुणवत्ता और पहुंच बढ़ाने के लिए संघर्ष किया जाए।
7. छद्म-विज्ञान और अवैज्ञानिक स्वास्थ्य धारणाओं का विरोध
छद्म-विज्ञान, अवैज्ञानिक उपचारों, स्वास्थ्य संबंधी मिथ्या प्रचार तथा हिंदुत्व-प्रेरित स्वास्थ्य विमर्श का पर्दाफाश और विरोध किया जाए।
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8. चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण का विरोध करी
चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और व्यवसायीकरण के विरुद्ध संघर्ष किया जाए। एनईईटी जैसी केंद्रीकृत प्रवेश परीक्षाओं का विरोध किया जाए जो समानता, सामाजिक न्याय और राज्यों की स्वास्थ्य आवश्यकताओं को कमजोर करती हैं तथा महंगे और बहिष्कारी कोचिंग उद्योग को बढ़ावा देती हैं।
9. स्वास्थ्य व्यवस्था में संघवाद की रक्षा
स्वास्थ्य क्षेत्र में अत्यधिक केंद्रीकरण का विरोध किया जाए। राज्यों को उनकी आवश्यकताओं के अनुसार स्वास्थ्य नीतियां और कार्यक्रम बनाने एवं लागू करने की स्वायत्तता मिले तथा केंद्र सरकार की ओर से पर्याप्त और समयबद्ध वित्तीय सहायता सुनिश्चित की जाए।
10. समावेशी स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित की जाए
दिव्यांगजन, बुजुर्ग, एलजीबीटीक्यू समुदाय, दीर्घकालिक बीमारियों से ग्रस्त लोगों तथा व्यावसायिक स्वास्थ्य जोखिमों का सामना कर रहे श्रमिकों के लिए व्यापक स्वास्थ्य कार्यक्रमों की मांग की जाए। मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में पूर्ण रूप से एकीकृत किया जाए।
11. पर्यावरण और जनस्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित की जाए
शुद्ध पेयजल, सुरक्षित सीवरेज और स्वच्छता व्यवस्था, स्वच्छता कर्मियों के लिए सम्मानजनक कार्य परिस्थितियां, प्रदूषण मुक्त वायु तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से लोगों की सुरक्षा हेतु प्रभावी उपायों के लिए अभियान चलाया जाए।
12. वंचित समुदायों के लिए स्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाएं सुनिश्चित की जाएं
दलित और आदिवासी बस्तियों तथा शहरी झुग्गियों में स्वास्थ्य सेवाओं सहित आवश्यक सार्वजनिक सेवाओं की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।
13. शारीरिक गतिविधियों और कल्याण को बढ़ावा
सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों और आर्थिक रूप से कमजोर क्षेत्रों में खेल के मैदानों, खेल सुविधाओं और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का विस्तार किया जाए।
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14. व्यावसायिक और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिए जवाब दे ही
व्यवसायिक रोगों और पर्यावरणीय स्वास्थ्य खतरों के लिए प्रबंधन को कानूनी रूप से जवाब देह बनाया जाए।
स्वास्थ्य क्षेत्र में तत्काल करने के काम
1. स्वास्थ्य क्षेत्र में पार्टी और जनसंगठनों के हस्तक्षेप को मजबूत करना
स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को स्वतंत्र रूप से उठाकर, व्यापक स्वास्थ्य मंचों में सक्रिय भागीदारी करके, राज्य और केंद्र स्तर पर स्वास्थ्य नीतियों के प्रश्नों को निरंतर उठाकर तथा नियमित अभियान चलाकर हस्तक्षेप को मजबूत किया जाए।
2. क्षमता निर्माण
पार्टी और जनसंगठन कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और अनुभव-विनिमय आयोजित किए जाएं। ग्राम स्वास्थ्य अधिकार समूह बनाए जाएं और स्वास्थ्य अधिकार स्वयंसेवकों को भर्ती किया जाए एवं प्रशिक्षण किया जाए।
3. संयुक्त कार्यक्रम और गठबंधन मजबूत करना
स्वास्थ्यकर्मियों के साथ समन्वित कार्यक्रम चलाए जाएं तथा प्रगतिशील, वामपंथी और लोकतांत्रिक संगठनों एवं पीपुल्स हेल्थ मूवमेंट जैसे मंचों के साथ सहयोग को मजबूत किया जाए।
4. स्वास्थ्य पेशेवरों और क्षेत्रीय संगठनों के बीच कार्य
डॉक्टरों, आशा कार्यकर्ताओं, पैरामेडिकल कर्मचारियों, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव संगठनों तथा जनविज्ञान एवं स्वास्थ्य आंदोलनों के बीच पार्टी कार्य को मजबूत किया जाए।
5. स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के विभिन्न स्तर
स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्य निम्न स्तरों पर समानांतर रूप से किया जाएः नीति स्तरः स्वास्थ्य नीतियों, बजट और नियामक ढांचे पर हस्तक्षेप ।
वर्गीय/तबकाती स्तरः श्रमिकों, महिलाओं, युवाओं, बच्चों, बुजुर्गों आदि के बीच आंदोलन और सेवा कार्य।
स्थानीय स्तरः मोहल्लों और समुदायों में आंदोलनात्मक तथा सेवा-आधारित गतिविधियां ।
विशेष ध्यान शहरी झुग्गियों, दलित बस्तियों, आदिवासी क्षेत्रों और अल्पसंख्यक समुदायों पर दिया जाए।
6. पार्टी-नेतृत्व वाले स्वास्थ्य मंचों का गठन
जहां ऐसे मंच मौजूद नहीं हैं, वहां राज्य स्तर पर पार्टी समर्थकों के नेतृत्व में स्वास्थ्य मंचों का गठन किया जाए।
7. छात्रों, श्रमिकों और उद्योग में हस्तक्षेप
मेडिकल और पैरामेडिकल छात्रों, सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्यकर्मियों तथा औषधि उद्योग के कर्मचारियों के बीच व्यवस्थित हस्तक्षेप की रणनीति विकसित की जाए।
8. स्थानीय अध्ययन और शोध-आधारित हस्तक्षेप
स्वास्थ्य मंच नियमित रूप से स्थानीय और क्षेत्रीय स्वास्थ्य स्थितियों का अध्ययन करें तथा उनके आधार पर ठोस समाधान और कार्ययोजनाएं प्रस्तुत करें।
9. स्वास्थ्य जागरूकता अभियान
जनसंगठनों, व्यापक मंचों और पार्टी स्वास्थ्य मंचों के माध्यम से नियमित स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
10. आंदोलनात्मक कार्यक्रम
स्थानीय स्तर पर विशिष्ट स्वास्थ्य समस्याओं और मांगों पर आंदोलन और अभियान चलाए जाएं। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (पीएचसीज) और स्थानीय
स्वास्थ्य समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाए।
11. सेवा-उन्मुख स्वास्थ्य पहल
जन-अस्पतालों और क्लीनिकों को सहयोग और समर्थन।
गांवों, बस्तियों और शहरी झुग्गियों में नियमित चिकित्सा शिविर ।
उपशामक (पेलियेटिव) देखभाल ।
जेनेरिक दवा दुकानें।
सामुदायिक स्वास्थ्य क्लीनिक ।
रक्तदान समूह और नेटवर्क।
स्वास्थ्य आपात स्थितियों में लोगों की सहायता।
12. जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य आंदोलन का निर्माण
ग्राम स्वास्थ्य अधिकार समूहों का गठन किया जाए तथा स्वास्थ्य अधिकार स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया जाए। स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, गरिमा और न्याय के मुद्दों पर जनआंदोलन विकसित किया जाए।
13. राज्य स्तरीय कैडर बैठकें
अखिल भारतीय सम्मेलन की तर्ज पर राज्य स्तरीय कैडर बैठकों का आयोजन किया जाए।
14. अखिल भारतीय समन्वय समिति
स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों के समन्वय हेतु अखिल भारतीय स्तर पर पार्टी समन्वय समिति/मंच का गठन किया जाए।
15. डिजिटल समाचार बुलेटिन
स्वास्थ्य क्षेत्र की गतिविधियों और विभिन्न राज्यों के अनुभवों के आदान-प्रदान हेतु डिजिटल समाचार बुलेटिन/न्यूज़लेटर प्रकाशित किया जाए।
16. राज्य स्तरीय स्वास्थ्य सम्मेलन
स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों को प्रमुखता से उठाने के लिए व्यापक राज्य स्तरीय स्वास्थ्य सम्मेलन आयोजित किए जाएं।
यह व्यापक रूपरेखा राजनीतिक संघर्ष, संगठनात्मक सुदृढ़ीकरण, गठबंधन निर्माण, जन अभियानों, सेवा गतिविधियों और जमीनी स्तर की लामबंदी को एकीकृत करती है, ताकि पार्टी के नेतृत्व में और व्यापक वामपंथी एवं जनतांत्रिक मोर्चे के अंतर्गत एक सशक्त, जनोन्मुखी स्वास्थ्य आंदोलन का निर्माण किया जा सके।
जून..2026
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