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एक बर एक ताई एकली ए फिलम देखन चाली गई शीला टॉकीज पै।
टिकट ली अर जा बैठी आगै सी
फिलम देख कै जब वापस आई तो एक छोरे ने बुझ लिया -
री ताई पिक्चर देख आई के..?
थोड़ी सी रुक सी कै ताई बोली - रे छोरे के बताऊँ तन्ने....
छोरा बोल्ला- के बात होगी ताई...?
बता मैं के मदद कर सकूं सूं?
ताई बोल्ली- बात के होणी थी....
जद मै फिलम देखण लागी तो फिल्म मैं मेरे जेठ जीसा एक मरद था...
छोरा- फेर के होया तो....?
ताई:- फेर के होणा था, सारी फिलम मैं मैं घूंघट काढ़ कै बैठी री.....
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एक बै एक छोरी भूखी रोवै थी। घर मैं रोटी थी कोण्या। उसकी माँ नै बहोत समझाई । पर बातां तैं के भूख भाजै थी। रोवणा कोण्या बन्द करया । वा और ठाड्डू रोवण लाग्गी। उसकी माँ नै दो धौल बी धर दिए फेर बी चुप कोण्या हुई छोरी। इतने मैं पड़ौसन आगी अर बोली," नफे की बहू !या छोरी क्यूँ रूआ राखी सै?"
वा बोली," रोटी मांगै सै।"
पड़ौसन बोली," देंती क्यों नहीं ?"
माँ बोली, " रोटी तै कोण्या ना ।"
पड़ौसन सोच साच कै बोली," इसनै टांड पै बिठा दे । "
माँ बोली," टांड पै के रोटी धरी सैं?"
पड़ौसन बोली," बिठा तो सई।"
माँ नै छोरी टांड पै बिठा दी।
छोरी टांड पै भी रोन्ती रही फेर उसनै रोटी मांगनी बन्द करदी अर बोली," माँ मनै बस इस टांड पर तैं तार दे।
भूलगी रोटी नै ।
सोचियो!!!!!!!!
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फत्ते चूर्ण की गोलियाँ बेच्या करता। उसनै सोच्या, पीसा कामवन की खातर धंधा बदलना चाहिए। वो उत्तर प्रदेश के एक कस्बे मैं गया। लांबे बाल अर दाढ़ी बढ़ा ली अर भगवा चोला अर माला धारण कर ली। फेर वेहे चूर्ण की गोली लड़का होवण के नाम पै देनी शुरू कर दी। दस मैं तैं औसतन चार-पाँच को लड़का होवै ए सै । तो वे बीरबाणी इस बाबाजी का प्रचार करण लागगी। फेर के था, बाबाजी की दूकान चाल पड़ी। इसे किस्यां तैं हमनै सीख लेवण की ज़रूरत सै। इन बाबाओं नै कल्याणकारी ना समझां, इनके पाखंड नै समझां अर दूसरयां तैं भी इनकी पोल पट्टी खोलाँ। इसे मैं म्हारे समाज अर देश की भलाई सै।
आओ, यो छोरे - छोरी के साच का भी बेरा पाड़ ल्याँ। विज्ञान कहवै सै अक लड़का या लड़की होगी- इसके मामले मैं बीरबानी की कोये भूमिका कोन्या। पुरुष धोरै एक्स और वाई-दोनों ढाल के गुणसूत्र कुदरत नै दिये सैं, जबकि बीरबानी धोरै बस एक्स गुणसूल होवैं सैं। जै एक्स तैं एक्स का संयोग होज्या तो मतलब साफ सै छोरी अर एक्स तैं पुरुष के वाई का संयोग होज्या तो होगा छोरा। संसर्ग के बाद गुण-सूत्रों के तेईसवें जोड़े का मिलन ही लड़की या लड़के का होना तय करै सै। तो पुरुष और योग-दोनों पै निर्भर करै सै अक छोरा होगा अक छोरी होगी ? म्हारे समाज, विशेष रूप तैं उत्तर भारत मैं, बीरबानी कै जै छोरी पैदा होज्या तै वा नफरत की नजर तैं देखी जावै सै , जबकि छोरा होण पे उसका बाप मूंछों को ताव देवण लागज्या सै। यह अनपढ़ता और पिछड़े समाज की निशानी है। दिमाग में भरी अंधविश्वासों की गंदगी सिर्फ तर्कपूर्ण सोच और विवेक से ही निकल सकती है
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थलियां गई थी
एक गांव मैं एक वासी रमलू अपनी ऊंटनी नै थलियों पै चरावण लेग्या। उड़े घास घूस चरया। फेर एक खेत मैं कचरी खूब लागरी थी। ऊंटनी नै रज कै खाई। खाते खाते एक गडूंबा भी खा लिया । ओ गले मैं फंसग्या । गामोली रमलू सैड़ दे सी ऊंटनी नै गाम मैं ल्याया अर वैद जी बुलाए। देखी वैद जी नै। बोल्या.. थलियां गई थी? कचरी खाई थी? रमलू बोल्या हां वैद जी।
वैद बोल्या..एक दूसेरी और एक पसेरी ल्याओ । आगी।
ऊंटनी जय कर कै बिठाई फेर लिटा दी। पसेरी उसकी नाड़ तलै धरदी अर दूसेरी जोर तैं उसकी नाड़ की सोजिश पै मारी। ऊंटनी का मोटी कचरी (गडूम्बा) था वो फुटग्या आर ऊंटनी ठीक होगी।
कुछ दिन पाछै एक बुढ़िया कै नाड़ पै कैंसर की गांठ ऊभरगी । खावण मैं दिक्कत होगी । तो उसका घर आला रमलू वैद जी धौरै गया। वैद जी तै लोगां नै रिश्तेदारी मैं गए बताए। उड़े कई लोग बैठे थे। एक नै बुझया.. के बात होगी?
रमलू: घराली कै नाड़ मैं गांठ सी दिखै सै अर रोटी निगलण मैं दिक्कत होरी सै।
कमलू बोल्या.. ईसा ईसा तो इलाज मैं भी कर दिया करूं वो ऊंटनी के इलाज आले दिन था उड़े।
बुला ली धमलो ताई ।
वो बोल्या..थलियां गई थी?
रमलू बोल्या..ना।
कमलू.. कैह दे - हां ,सोण हो सै।
रमलू..हां गई थी।
कमलू.. कचरी खाई थी ?
रमलू.. गई ए कोन्या तो कचरी कित तैं खावै थी।
कमलू..कैह दे.. हां, सोण हो सै।
रमलू..हां खाई थी।
कमलू..तै लिया पसेरी अर दुसेरी।
लिटा कै बुढ़िया कमलू पसेरी नाड़ तलै धर कै बोल्या..कचरी खाई थी?..
दुसेरी जोर तैं मारी नाड़ पै।
धमलो ताई का तो होग्या इलाज।
गई ऊपर....
इसे वैदों तैं बच कै.....
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चश्मा
माता जी शायद उम्र के साथ सठिया गईं थीं। एक दिन बोलीं, "देवेंद्र, तुम सबकी शक्लें ही समझ में नहीं आतीं। मेरी एक इच्छा तो पूरी कर दे। मेरा चश्मा बनवा दे।"
पर दत्त साहब को फुरसत न मिली, न मिलने वाली थी। बेचारे क्या करते। जेब इजाजत ही नहीं देती थी। एक दिन उम्र ने खेल दिखाया। माता जी चल बसीं।
आज देवेंद्र दत्त अखबार पढ़ रहे हैं। उनकी पत्नी बाजार से लौटी हैं। खूब सारा सामान खरीद कर लाईं हैं। बड़े अच्छे मूड में हैं। आते ही बोलीं, "आज यह नया धूप का चश्मा खरीद कर लाई हूं। जरा निगाह उठाकर तो देखो, तुम्हारी चार बच्चों की मां चश्मे में कैसी जंच रही है।"
धूप के इस चश्मे की कीमत में बूढ़ी मां के पांच निगाह के चश्मे आ सकते थे।
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टोटका
हुक्का
धमलो नै पूरा जोर ला कै देख लिया , फेर रमलू अपने पतिदेव, के विचारों नै को बदल कोन्या पाई। रमलू हुक्के का कसूता पियक्कड़ सै। एक दिन धमलो नै रमलू तैं एक सवाल पूछया, "थारी निगाह मैं हुक्का पीना एक भुनडी लत सै अक नहीं?"
रमलू गरम होग्या। पर सैड़ दे जी नरम भी होग्या। थोड़ी सी देर छात कान्हीं लखाणता रहया । फेर हुक्का गुड़गुड़ाया अर धूम्में की हवा छोड़ते होये किसे ज्ञानी की ढालाँ बोल्या, "हुक्का पीना एक शान सै मेरी खातर। फेर आच्छे या नुकसान दायक पै बहस का के फायदा?"
धमलो नै एक बै फेर हटकै पुनः शांतमुद्रा मैं एक सवाल कर दिया , "यो मेरे सवाल का जवाब कोन्या चौधरी । थाम तो या बताओ अक थाम अपने बेटे नै हुक्का पीवन की सलाह देवोग़े अक नहीं?"
रमलू चौधरी एक बै फेर गरम होग्या। इब कै वो नरम नहीं पड़या । रमलू मुंह चढ़ा सी कै बोल्या, "मैं कदे किसे नै सलाह नहीं द्यूंगा अक हुक्का पिया करो। फेर या भी तोड़ की बात सै अक हुक्का पीना मैं कदे छोडूंगा भी नहीं।"
धमलो कुछ ना बोलीं। वा सहज सहज हुक्के कै धोरै गयी। चिलम भर कै ल्याई अर हुक्का पकड़ कै बोली आ दोनों बैठ कै पीवाँग़े । रमलू बोल्या या अच्छी बात कोन्या।
धमलो तो फेर ?
उस दिन पाछै रमलू नै हुक्के कै हाथ नहीं लाया।
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जब भी ओले पड़या करते तै
दादी ताई भाज कै नै बगड़ मैं तवा उल्टा धर दिया करती ।
देखण मैं आवै सै अक कोए कोए यो टोटका आज भी अपनावैं सैं,
इस उम्मीद मैं अक ओले पड़ने बंद हो ज्यांगे ।
असल मैं या बेबसी थी किसान की प्रकृति के साहमी क्योंकि जै ओले पड़ेंगे तो खेती नै नुकसान पहुंचावैंगे अर हो सकै सै फेर यो तवा चढ़ेगा भी अक नहीं।
इस कर कै इसनै उल्टा करकै डाल दिया जावै था ।
एक आध बर संयोग तैं ओले रुक भी जावैं थे,
तो फेर यो टोटके के रूप मैं बरत्या जावण लाग्या।
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भैंस अक घर आली ?
आज रमलू घणा फिक्र मैं सै। उसकी घर आली धमलो के पेट मैं दर्द सै । ऊं तो यो दर्द दो तीन सालाँ तैं कई बार हो लिया
पर आज यो जोर का होग्या , हटण का नाम ए कोन्या लेरया ।
रमलू नै सोच लिया अक वो आज तै धमलो नै शहर ले जाकै किसे बड़े डॉक्टर नै दिखावैगा। वो उस नै शहर ले चल्या ।
शहर मैं एक डॉक्टर का बड़ा नाम था। रमलू नै उसे धोरै ले ज्याण का फैसला कर लिया। बस अड्डे पर तैं उतर डॉक्टर साहब के घर पहुंच पहुंचग्या रमलू धमलो
गेल्यां।
जब नंबर आया, तो डॉक्टर साहब नै बड़ी आच्छी ढालां धमलो देखी अर कुछ जाचें और भी बता दीं।
इब तै रमलू कुछ परेशान सा होग्या । वो तो उसे दिन गांव पहुंचना चाहवै था, उसनै डॉक्टर तैं बुझया , "क्यों डॉक्टर साहब, बगैर जांच काम नहीं हो सकता के? मैं तो आजै गांव पहुंचना चाहूं सूं।"
डॉक्टर साहब नै जांच का महत्व समझाया। फिर पूछा, "तुमको इतनी जल्दी क्यों है? कौन तुम्हें नौकरी पर पहुंचना है?"
रमलू घबराया सा बोल्या , "नौकरी तैं भी बड्डी चिंता सै डॉक्टर साहब। मेरे घर मैं भैंस ब्या री सै। वहां मेरा रहना जरूरी सै।"
डॉक्टर साहब मुस्कुरा कर बोले, "तुम्हारी भैंस ज्यादा जरूरी है या घरवाली?"
रमलू नै गंभीर स्वर मैं सवाल भरया जवाब दिया, "फिलहाल तो भैंस ज्यादा जरूरी सै। या मरगी तो दूसरी आ ज्यागी अर दहेज भी लयावैगी, पर जै भैंस मरगी, तै दूसरी खरीदण के पीसे के आप देवोगे?"
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