बहादुरशाह ज़फर को दो गज़ ज़मीन नहीं मिली, और हम आज भी इतिहास बाँट रहे हैं।
मुगलों ने भारत को एक किया, नाम ‘हिन्दुस्तान’ रखा — चाहें तो इस्लामी नाम भी रख सकते थे, कोई विरोध नहीं करता। उसी दौर में रामपुर, सीतापुर बने, *रामचरितमानस* लिखी गई। लेकिन आज इलाहाबाद और फैज़ाबाद चुभते हैं — क्योंकि इतिहास अब भावनाओं से नहीं, एजेंडे से पढ़ा जाता है।
बहादुरशाह ज़फर ने देश के लिए सब कुछ खो दिया — बेटे, तख़्त, मिट्टी तक। रंगून में दफ़न हुए, कब्र तक मिटा दी गई। और आज?
अगर ज़फर अंग्रेजों से मिल जाते, तो वाडियार, सिंधिया, जयपुर की तरह उनके वंशज भी आज मंत्री-विधायक होते। लेकिन उन्होंने लड़ाई चुनी — और इतिहास ने उन्हें भुला दिया। आज ‘भारत माता की जय’ कहने से देशभक्ति तय होती है — चाहे इतिहास गद्दारी का रहा हो।
दुर्योधन ने कहा — “मैं जानता हूँ क्या सही है, लेकिन कर नहीं पाता।” यही दुविधा हर इंसान की है — जब ज्ञान होता है, लेकिन नियंत्रण नहीं।
धर्म नहीं लड़ते — कट्टरपंथी लड़वाते हैं। राजनीति ने धर्म को हथियार बना दिया। गुरुनानक साहिब ने कहा — “ईश्वर एक है, रूप अनेक हैं।” लेकिन सत्ता की भूख ने उस एकता को टुकड़ों में बाँट दिया।
दुर्योधन की दुविधा, ज़फर की त्रासदी और आज की देशभक्ति !!
👉 यह पोस्ट इतिहास, मनोविज्ञान और समकालीन विडंबना को एक साथ रखता है
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