नीचे आपके दिए गए पूरे पंजाबी टेक्स्ट का स्पष्ट, संक्षिप्त और सुगम हिन्दी रूपांतरण दिया जा रहा है।
(भाव, तर्क और आंदोलन की तीव्रता को यथावत रखते हुए।)
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#खेती_के_बीज_नाश_के_लिए_बीज_बिल_2025
केंद्र सरकार बीज बिल 2025 लेकर आई है। यह बिल खेती और राज्यों के अधिकारों पर सीधा हमला है। खेती और कृषि अनुसंधान राज्यों का विषय है, जिसके बारे में केंद्र के पास क़ानून बनाने का अधिकार नहीं, फिर भी केंद्र लगातार केन्द्रीकरण थोप रहा है।
इससे पहले केंद्र ने तीन कृषि कानून लाए थे जिनके ख़िलाफ़ बड़ा आंदोलन हुआ। सरकार ने वे कानून वापस तो ले लिए, लेकिन कॉरपोरेट-पक्षी और किसान-विरोधी नीति जारी रखी। कभी मार्केटिंग पर नया मसौदा, ताकि मंडियों का निजीकरण किया जा सके, और अब यह नया बीज बिल 2025, जिसके ज़रिए देसी-विदेशी बड़ी कंपनियों को बीज क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण देने की तैयारी है।
बीज क्षेत्र पर नियंत्रण का मतलब — पूरी खेती पर नियंत्रण।
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**बीज बिल 2025 क्या है? इसकी धाराएँ क्या कहती हैं?
कैसे यह राज्यों और किसानों के अधिकारों पर डाका है?**
🔹 केंद्रीय बीज समिति — पूरा नियंत्रण (धारा 3 और 5)
बिल कहता है कि एक केंद्रीय बीज समिति बनेगी, जो—
बीज योजना,
बीज विकास,
उत्पादन, भंडारण,
आयात-निर्यात,
बीज परीक्षण,
पंजीकरण के मानक,
और यह तक तय करेगी कि कौन-सी किस्म राष्ट्रीय है और कौन राज्य की।
यानी सारा नियंत्रण केंद्र के हाथ।
🔹 राज्य बीज समिति (धारा 10) — केवल नाम की सत्ता
राज्य बीज समिति बनेगी, पर उसके अधिकार सीमित हैं।
असली ताकत केंद्रीय समिति के पास है—यह आगे की धाराओं से साफ़ होता है।
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🔹 बीज पंजीकरण (धारा 13)
कोई भी बीज बिना पंजीकरण के नहीं बिक सकता।
बिल कहता है कि किसान अपना घर का बीज रख सकता है और उसे रजिस्ट्रेशन की ज़रूरत नहीं—
पर असलियत में किसानों के पास घर का बीज बचा ही कहाँ है?
हरित क्रांति, मोनो-कल्चर और बाज़ार से खरीदे जाने वाले बीजों ने किसान को डिपेंडेंट बना दिया है।
नई किस्में अनुसंधान संस्थान बनाते हैं—किसान नहीं।
तो किसान घर का बीज कैसे चलाएगा?
यह प्रावधान सिर्फ़ दिखावटी है।
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🔹 धारा 16 — बीज परीक्षण, केंद्र + प्राइवेट + विदेशी
केंद्र तय करेगा कि कहाँ-कहाँ बीजों के ट्रायल होंगे।
सूची में शामिल हैं:
ICAR,
केंद्रीय व राज्य कृषि विश्वविद्यालय,
और “अन्य संस्थाएँ” यानी निजी कंपनियाँ।
मतलब—अब बीज अनुसंधान सिर्फ सरकारी विश्वविद्यालय नहीं करेंगे,
बल्कि प्राइवेट कंपनियों को भी बराबर वरीयता मिलेगी, यानी नियंत्रण धीरे-धीरे कंपनियों के पास जाएगा।
सरकारी कृषि शिक्षा और अनुसंधान पहले ही कमजोर किए जा रहे हैं—पंजाब, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, हिमाचल से उदाहरण साफ़ हैं।
धारा 16(3)
केंद्र सरकार विदेशी संस्थानों को भी मान्यता दे सकती है — यानी विदेशी कंपनियों को पूरी खुली छूट।
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🔹 धारा 17(8) — Ease of Doing Business के नाम पर कंपनियों को विशेष अधिकार
कंपनियों को "खेत-खेत में काम आसान" के नाम पर मल्टी-स्टेट ऑपरेशन की स्वीकृति,
यानी उन्हें पूरे देश में खुला प्रवेश।
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🔹 धारा 19 — नर्सरी भी बिना पंजीकरण नहीं चल सकती
हर नर्सरी को रजिस्टर होना ज़रूरी — छोटे उत्पादकों पर भार।
राज्य चाहें तो छूट दे सकते हैं, पर असल नियंत्रण फिर केंद्र के पास।
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🔹 धारा 22 — बीज कीमत नियंत्रण में अत्यधिक अस्पष्टता
केंद्र केवल “आपात स्थिति” में कीमत तय करेगा।
आपात स्थिति क्या है? बिल चुप है।
मतलब कंपनियाँ अपनी मर्ज़ी से रेट तय करेंगी — किसानों की खुली लूट।
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🔹 धारा 24 और 27 — बीज प्रमाणन एजेंसियों पर कंपनियों का कब्ज़ा
अब देसी-विदेशी बड़ी कंपनियाँ खुद भी बीज प्रमाणन कर सकेंगी।
दुनिया की 6–7 बड़ी कंपनियाँ पहले ही 75% वैश्विक बीज व कृषि-रसायन बाजार पर कब्ज़ा कर चुकी हैं—
और भारत में भी उन्हें पूरा रास्ता दिया जा रहा है।
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🔹 धारा 31 — बीज निरीक्षक
एक बीज निरीक्षक का सीमित क्षेत्र होगा।
पूरे राज्य में अगर कोई कंपनी घटिया बीज दे दे तो कार्रवाई कौन करेगा?
क्या एक निरीक्षक बहुराष्ट्रीय कंपनी से लड़ सकता है? सरकारें भी नहीं लड़ पातीं!
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🔹 धारा 33 — विदेशी अन-पंजीकृत बीजों को अनुमति
विदेशी कंपनियों को अनपंजीकृत बीज भारत में आयात करने की खुली इजाज़त—
जबकि भारतीय बीज बिना पंजीकरण के नहीं बिक सकते।
यह दोहरा रवैया “राष्ट्रवाद” की हकीकत दिखाता है।
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🔹 धारा 34–37 — सज़ाएँ, लेकिन किसानों के लिए कोई सुरक्षा नहीं
किसान की फसल खराब हो जाए — शिकायत कहाँ?
मुआवज़ा कैसे? कितना?
बिल पूरी तरह चुप है।
कंपनियों पर कार्रवाई भी लगभग असंभव बना दी गई है।
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🔹 धारा 38 — केंद्र का अंतिम निर्णय
केंद्र राज्यों को निर्देश दे सकता है, और उसका निर्णय अंतिम होगा।
राज्य बीज समितियाँ केवल नाम की होंगी।
GM सरसों ट्रायल जैसे उदाहरण पहले ही दिखा चुके हैं कि केंद्र ने राज्यों को निष्क्रिय बना दिया है।
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🔹 धारा 43 और 47 — केंद्र को असीमित नियम बनाने की शक्ति
केंद्र कभी भी नोटिफिकेशन से नए नियम लागू कर सकता है।
यह बिल पूरी तरह केन्द्रीकरण है।
और केंद्रीय बीज समिति में बीज कंपनियों के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।
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निष्कर्ष — यह बिल किसान-विरोधी और राज्य-विरोधी है
बीज बिल को अलग-अलग देखकर इसकी मार कम लग सकती है,
पर यदि इसे केंद्र की पूरी कृषि नीति के संदर्भ में देखें—
तो यह स्पष्ट है कि सरकार
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स,
आयातित सस्ता गेहूं-दूध-मक्का,
और बीज क्षेत्र पर कॉरपोरेट नियंत्रण
के ज़रिए भारतीय कृषि को साम्राज्यवादी मॉडल में धकेल रही है।
इसीलिए बीज बिल 2025 को रोकना ज़रूरी है।
किसानों के अधिकार, राज्यों की संघीय व्यवस्था और भारत की बीज संप्रभुता की रक्षा के लिए
मज़बूत आंदोलन तैयार करना होगा।
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