शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

गरीबी


पिछले 15 सालों  में भारत के खरबपतियों की 
सम्पत्ति 12 गुणा हो गयी है  । यह धन देश की 
गरीबी को दो बार दूर करने के लिए काफी है 



मुकेश अम्बानी

इस सूचि में मुकेश अम्बानी  सम्पत्ति सबसे अधिक है और 
सभी 70 खरबपतियों की मूल जमा सम्पत्ति 390 बिलियन 
डॉलर यानि 24  लाख करोड़ रूपये के बराबर है , जो कि देश 
के कुल घरेलू उत्पाद का एक चौथाई है । शीर्ष 10 खरबपतियों 
की निजी सम्पत्ति का जोड़ देश की जी  डी  पी का 6 प्रतिशत 
बैठता है । 


डॉलर खरबपति

2014 में हुरून द्वारा दुनिया भर के अमीरों की जारी की गयी  सूची के अनुसार अनुसार भारत में 70 डॉलर खरबपति हैं। (ध्यान दें रूपये के मौजूदा दर के हिसाब से एक बिलियन डॉलर 6300 करोड़ रूपये के बराबर है ) 2013 की इसी सूची के मुकाबले इस आंकड़े में 13 का इजाफा हुआ है । यानिकि  साल  में देश में डॉलर खरबपतियों की संख्या  33 प्रतिशत बढ़ गयी । 

आखिर किस कीमत पर

आखिर किस कीमत पर
हम में से एक हिस्से की कुछ ऐसी मानसिकता बनती जा रही है
कि मुझे आज जीना है पूरे ऐशो आराम के साथ चाहे  इसके वास्ते
अपनी नैतिकता गिरवी रखनी पड़े , चोरी या हत्या करनी पड़े , 
माँबाप भाई बहन की सुपारी देनी पड़े ,
 झूठ बोलना पड़े , घोटाले में हिस्सेदार होना पड़े
 या देश बिदेशी कंपनी को गिरवी रखना पड़े,
वातावरण का प्रदूषण किसी भी हद तक करना पड़े , 
मिलावट किसी हद तक करनी पड़े  
 इस सच्चाई को ढंकने के लिए लच्छेदार जुमले
 घड़ना भी खूब आता है 
जैसे राष्ट्र प्रेम , भारत महान आदि आदि ।







GDP

1991 से 2002 के बीच जहाँ अर्थव्यवस्था में कुल जमा पूंजी में 
4 गुणा बढ़ोतरी हुई है, वहीँ निजी कार्पोरेट क्षेत्र में यह 9 गुणा बढ़ 
चुकी है । (स्रोत -सी एस ओ , नेशनल अकाऊंट्स स्टैटिस्टिक्स ) 
कार्पोरेट सैक्टर के बढ़ते मुनाफे का अंदाजा इस बात से लगाया जा
 सकता है कि जहाँ आजादी से लेकर 1991 के बीच निजी कारपोरेट
 क्षेत्र के बजट तथा जी डी पी का अनुपात 2 फीसदी के स्तर पर बना
 रहा था, वहीँ 2007 -2008 में यह बढ़कर 9. 4 फीसदी पहुँच चुका  था 
 और अब 8 फीसदी के करीब है । 

गुरुवार, 25 सितंबर 2014

Communist Hain Maidaan Mein

दो भारतों की सच्चाई

     दो भारतों की सच्चाई 
शर्मनाक अमीरी - बेहताशा गरीबी 
अमीर और अमीर हो गए 
बड़े पूंजीपतियों ने अपनी संपत्ति में अपार बढ़ोतरी की है
क्या आप अन्दाजा लगा सकते हैं ??
1990 में टाटा समूह की कुल पूंजी 10 ,922 करोड़ रूपये थी , वहीं
2012 -13 तक यह बढ़कर 585 ,554 करोड़ रूपये हो चुकी  थी ।
आई किमैं समझ मैं अक म्हारी कमाई किट जावै सै । कांग्रेस और
बी जे पी दोनों केंद्र्र   मैं रैहली इस बीच मैं ???
( स्रोत --टाटा समूह की वेबसाइट से )

इसी  दौर में अंबानी परिवार के रिलायंस समूह ने अपनी सम्पत्ति 
3167 करोड़ रूपये से बढाकर 500 ,000 करोड़ रूपये कर ली (रिलायंस वेब साईट )
 रिलायंस 

सोमवार, 22 सितंबर 2014

जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा

जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा
संयोजक ... सतनाम....09466290728
हमारे संसार के पूरे इतिहास में सभी की सभी सभ्यताएं बीमारी और रुगण्ता के खतरों के साथ पली हैं। हम देख और जान सकते हैं कि प्रत्येक सभ्यता ने इस हकीकत से निपटने के समयानुसार अपने अपने तरीके ईजाद किये, मगर रोग मुक्त जीवन का सपना तो पिछली दो सदियों से ही देखा जाने लगा है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विकास से हमें बीमारी की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप के औजार मिले किन्तु आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के शुरूआती पुलाव के बाद चिन्ताएं भी पैदा हुई हैं। पिछले सालों में भारत की स्वास्थ्य सम्बंधी स्थिति में कई अहम बदलाव आये हैं। पिछले दशकों में दवाइयों और कीटनाशकों के विरूद्ध प्रतिरोध की समस्या उभरी है और संक्रामक व परजीवी जनित बीमारियों ने फिर से सिर उठाया है। जैनेटिक खोजों के कारण उपजी बीमारियों का दायरा बढ़ा है और एडस का नया खतरा तो मुँह बाये खड़ा ही है। इस सबसे लड़ने के लिए जिस तरह के बदलाव की जरूरतें हैं वह नहीं हो पा रही हैं।
इसको ठीक करने के वास्ते दरकार तो समाज के ढांचे में बदलाव की थी मगर जो असल में हुआ वह है ढांचागत समायोजन। हमारे देश भारत में सन 1991 में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम को अपनाया गया। हमें यही कहा गया कि हमारी ‘कमजोर’ अर्थव्यवस्था में यह एक जान फूंकने का प्रयास है। ‘विश्व बैंक’ और ‘मुद्रा कोष’ द्वारा थोंपी गई शर्तों के अधीन देश की आर्थिक नीति में व्यापक बदलाव किये गये हैं और किये जा रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जरूरी दवाओं सम्बन्धी नियंत्रण खत्म किये गये, सरकारी अस्पतालों में सेवा शुल्क वसूली लागू करने के प्रयास किये गये, स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च में कटौती जारी है, इसके साथ-साथ निजीकरण को बढ़ावा बेइन्तहा दिया जा रहा है। कारपोरेट सैक्टर द्वारा संचालित बीमा कम्पनियों के माध्यम से सभी के लिए स्वास्थ्य का नारा लाने की पुरजोर कोशिशें की जा रही हैं।
’सन 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य’ का नारा जिस जोशो-खरोश से उछाला गया था, कुछ दिन उसे फुस फुसाया गया और अब तो बहुत से लोग नाम लेना भी भूल गये । इसके एवज में अब ‘चुनिंदा’ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को ही एकमात्र विकल्प बताकर पेश किया जा रहा है। ऐसी हालत में यह और भी जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्य सम्बन्धी बहस को एक बार फिर से नये सिरे से छेड़ा जाए और इसकी समीक्षा की जाए। अन्यायपूर्ण नीतियों को रोकना और संसाधनों व सता के असमान वितरण के प्रयासों का विरोध लोगों की संगठित ताकत से ही संभव है। लोगों का स्वास्थ्य एक अहम मुद्दा होते हुए भी उनका सामुहिक मुद्दा नहीं बन सका है।
स्वास्थ्य सभी नागरिकों के लिए एक मौलिक एवं सार्वभौमिक अधिकार है। इस अधिकार के साथ साथ स्वास्थ्य के उन निर्णायक मुद्यों व अंतरखण्डीय कारकों जैसे अच्छा भोजन, सुरक्षित साफ पीने योग्य पानी, बेहतर सफाई सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर रहन सहन व खान पान, रोजगार, प्रदूषण रहित वातावरण व खाद्य पदार्थ, लिंग जाति व वर्ग आधारित असमानता का निवारण, सभी के लिए स्तरीय व गुणवतापूर्ण शिक्षा, सामाजिक न्याय तथा वर्तमान बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की सभी के लिए उपलब्धता आदि की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। महज ‘थ्री डी-डाक्टर,डिजीज और डरग्ज-’ के पैमाने से स्वास्थ्य के मुद्दे को नहीं देखा जाना चाहिये और न ही इसे बाजार व्यवस्था में मुनाफे के रुप में देखा जाना चाहिये। खासतौर से तुरन्त लाभ हानि की नजर से नीति निर्घारकों को भी नहीं देखना चाहिये। दुर्भाग्य है हमारा कि हम इन संकीर्ण दायरों में ही स्वास्थ्य के मुद्दे को देख रहे हैं।
समेकित स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं भी स्वास्थ्य के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है । इस अधिकार को पूर्ण करने के लिए हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर संसाधनों से युक्त करने की , उसे विस्तारित करने की तथा उसे जवाब देह बनाने की आवश्यकता है जिससे देश की समस्त जनता को साथ में हरयाणा की जनता को मुफत , समेकित, उच्च गुणवता पूर्ण तथा आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं प्रदान की जा सकें।
सरकारी ढांचे में स्वास्थ्य सेवाओं में जरुरत के हिसाब से 76 प्रतिश त डाक्टरों और 53 प्रतिशत नर्सों की कमी है(आर एच एस ) । इसके साथ ही प्रयोगशालाओं में तकनीशियनों की 80 प्रतिश त और एक्सरे कर्मीयों की 85 प्रतिशत कमी है। यह राष्ट्रीय आंकडे़ हैं। हरियाणा के आंकड़े भी ज्यादा भिन्न नहीं हैं।-टेबल-
जिला स्तरीय हाॅस्पीटल की संख्या----2010--------21
कुल गांव की संख्या---2010-----------------6955
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010-------107---111
सब डिस्ट्रिक्ट हाॅस्पीटल की संख्या---2010 ............25
सब सैंटरों की संख्या----2010----------------2484
प्राथमिक सवास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010--------441

स्वास्थ्य सुविधाएं, मध्यम दर्जे के कार्यकर्ताओं पर टिकी हैं - नर्सें, ए.एन.एम. (दाइयां) और पैरा मैडीकल कर्मचारी (अर्द्ध चिकित्सा कर्मी)। ये कार्यकर्ता ही लोगों की सामाजिक आर्थिक समस्याओं के सम्पर्क में आते हैं। परन्तु खुद के स्वास्थ्य क्षेत्र के काम के विश्लेषण में इनकी भागीदारी न के बराबर है। पहली बात तो यह है कि निचले दर्जे में होने के कारण इनसे सिर्फ आदेशों के पालन करने की अपेक्षा की जाती है, निर्णयों में इनकी कोई भागीदारी नहीं होती है। दूसरी बात यह है कि इन्हें यदि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया जाए तो इनकी ट्रेनिंग इस तरह की नहीं हुई है कि ये अपने व्यवहारिक अनुभवों से अवधारणा या विचार विकसित कर सकें या अवधारणाओं को व्यवहार में बदल सकें।
जानकारी अपने आप बदलाव नहीं लाती। परन्तु जानकारी बदलाव की एक पूर्ण शर्त जरूर है। ‘समाज और स्वास्थ्य’ के माध्यम से देश में और हरियाणा में ‘जन स्वास्थ्य अभियान’ की यह कोशिश है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे विकास के ताजा घटनाक्रम को शामिल करके लोगों तक पहुँचा जाए ताकि हम सबको वर्तमान की झलक मिल सके और स्वास्थ्य सेवाओं तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जन पक्षीय आधार को मजबूत किया जा सके।
इस उपलक्ष्य में निम्नवत प्रस्ताव रखे जाते हैं जो कि मौजूदा स्वास्थ्य परीस्थिति, जो कि पूर्णरुप से खारीज करने लायक है, को पलट सकें तथा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां तथा स्वास्थ्य सेवाएं लागू करते हुए सबके लिए स्वास्थ्य का सपना साकार कर सकें।
1. हरयााणा में स्वास्थ्य के सामाजिक नियामकों पर ध्यान बहुत आवश्यक हो गया है- इसके अंतर्गत स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना , लोक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाना होगा जिसके तहत स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय शिशु स्वास्थ्य एवं पोष ण नीति बनाई जाए जिसके अंतर्गत आई.सी.डी.एस. का सार्वभौमिकी करण हो व तीन साल तक के बच्चों को पूर्ण रुप से शामिल करने हेतू सेवाओं तथा कार्यदल में विस्तार हो। समस्त गावों व मोहल्लों में शुद्ध एवं सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता हो तथा हर गांव व मोहल्ले में स्वच्छ शोचालयों तक सार्वभौमिक पहुंच हो।
2. हरयाणा में महिलाओं की स्थिति विचारणीय है। यहां स्वास्थ्य सम्बन्धित लैंगिक पहलूओं को सम्बोधित किया जाना आवश्यक है -इसके अंर्तगत समस्त महिलाओं तथा समलैंगिक नागरिकों को समेकित , आसानी से उपलब्ध उच्चगुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच व इसकी उपलब्धता की गारण्टी दी जाए जो कि केवल मातृत्व सवास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित न हो। उन समस्त कानून ,नीतियों तथा आाचरणों को समाप्त किया जाए जो कि महिलाओं के प्रजनन, यौनिक तथा जनतांन्त्रिक अधिकारों का हनन करता है। उन विभिन्न प्रजनन प्रोद्योगिकियांे को जो कि महिलाओं के लिए हानिकारक हो सकती हैं , नियंत्रित किया जाए । लिंग आधारित उत्पीड़न को एक लोक स्वास्थ्य समस्या माना जाए तथा इसके तहत शारीरिक एवम मानसिक रुप से पीड़ितों को तमाम आवष्यक स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजिकरण, रेफरल का अधिकार दिया जाए तथा समन्वित नैतिक चिकित्सीय कानूनी प्रक्रियाओं के लिए भी उन्हें अधिकृत बनाया जाए । स्वास्थ्य सेवाओं को किशोर किशौरियों के लिए मित्रता पूर्ण बनाया जाए तथा इस तबके को भी समेकित, उच्चगुणवता पूर्ण , आासनी से पहुंचने लायक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित हों जो कि उनके विशेष प्रजनन तथा यौनिक स्वास्थ्य आवश्यक्ताओं को पूरा करती हों।
3. हरयाणा में जाति समीकरण बढा है। समस्त जाति आधारित भेदभाव तुरंत समाप्त किया जाए- जाति आधारित भेदभावों को, जो कि बुरे स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है , पूर्णरुप से समाप्त करने हेतू त्वरित एवं प्रभावी कदम उठाये जाएं। मानव द्वारा मैला ढोने वाले समस्त मैनुअल कार्य पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित हों। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में इस भेदभाव से पीड़ित तबकों को प्राथमिकता दी जाए । इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पुर्नगठन किया जाए।
4. हरयाणा में स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को संवैधानिक बनाया जाए- देश में और प्रदेश में स्वास्थ्य के अधिकार का कानून लागू किया जाए जो कि समेकित, उच्चगुणवतापूर्ण, आसानी से उपलब्ध सेवाओं को सुनिश्चित करता हो तथा प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय स्तरीय सेवायें आवश्यकतानुसार सबको उपलब्ध करता हो। सेवा प्रदाता को सेवाओं को उपलब्ध नहीं कराने या मना करने पर ;चाहे गुणवता,पहुंच या खर्च से जुड़े हुए कारणों से भी हो। उसे कानूनी अपराध घोषित किया जाए।
5. हरयाणा में स्वास्थ्य के उपर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाए-सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 3--6 प्रतिशत को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित किया जाए जो कि 2014 की स्थिति में प्रति व्यक्ति 3000 रुपये बनता है। इस व्यय में कम से कम एक तिहाई केन्द्रिीय सरकार से राज्यों को उपलब्ध हो। हरियाणा सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1786 के लगभग है। एक मध्य सीमा के तहत स्वास्थ्य के उपर किये जाने वाले समस्त सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिषत तक बढ़ाया जाए।
6. हरयाणा के प्रत्येक जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं गुणवता सुनिश्चित की जाए-समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में सेवाओं की गुणवता सुनिश्चित की जाए जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी , सुरक्षित , गैर शोषणीय बनायें तथा लोगों को सम्मानपूर्वक सेवायें उपलब्ध हों। मरीजों के अधिकारों का आदर हो एवं मरीजों की आराम तथा संतुष्टि पर ध्यान दिया जाता हो। गुणवता का मानक केवल भौतिक या चिकित्सकीय संरचना पर आधारित न हो जो कि प्रायः बड़े कार्पोरेट अस्पतालों या मैडीकल टूरिज्म के लोग को बढ़ावा देते हैं तथा यह कम खर्च में सही एवं प्रभावी सेवाओं के प्रदाय को बढ़ावा नहीं देता है। समस्त लोक स्वास्थ्य संस्थान अपने स्तर पर गारन्टी की गई सभी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने हेतू बाध्य हों। समस्त लोक स्वास्थ्य सुविधाओं को किसी भी प्रकार के उपभोग्ता शुल्क से मुक्त किया जाए तथा सेवाएं शासन द्वारा संचालित सुविधाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएं न कि निजी सार्वजनिक सहयोग व्यवस्था से।
7. हरयाणा में स्वास्थ्य सेवाओं का सक्रीय एवं निष्क्रिय निजीकरण बंद हो- सक्रीय निजीकरण के तरीके ; जैसे सार्वजनिक संसाधन या पूंजी को निजी संस्थानों को वाणिज्यिक तौर पर हस्तानन्तरण करना ,पूर्ण रुप से बंद करने हेतू आवश्यक कदम उठाया जाएं। निष्क्रिय रुप से हो रहे निजीकरण को रोकने के लिए लोक सुविधाओं में निवेश बढ़ाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों से प्रदत सेवाएं केवल प्रजनन स्वास्थ्य,टीकाकरण एवं अन्य चुनिन्दा बीमारियों के नियन्त्रण पर सीमित न होकर समेकित स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हों।
8. हरयाणा के स्वास्थ्य कार्यदल का बेहतर प्रशिक्षण हो-- स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों की बेहतरीन शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश को बढ़ाया जाए। सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी शिक्षण संस्थानों द्वारा उन जरुरत मंद इलाकों से चिकित्सकों, नर्सों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों को आवश्यक संख्या में चयनित कर शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जा रहा है यह सुनिश्चित किया जाए। प्रशिक्षण नीति में बदलाव लाया जाए जिससे कि स्वास्थ्य कार्यदल द्वारा स्थानीय आवश्यक्ताओं को पूरा करने हेतू समस्त जरुरी दक्षताएं दी जा सकें। चिकित्सा तथा संबन्धित क्षेत्र के उच्च शि क्षा व्यवस्था के वाणिज्यिकरण बंद हों तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थित नियन्त्रण हेतू प्रभावी एवं पारदर्शी तन्त्र लागू किया जाए।भारतीय चिकित्सा परिषद,भारतीय नर्सिंग परिषद जैसी संस्थाओं व दूसरी विनियामक संस्थाओं को गहन समीक्षा के पश्चात पुनर्गठित किया जाए जिससे कि वर्तमान भ्रष्ट एवं अनैतिक व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
9. बेहतर शासित ,प्रयाप्त लोक स्वास्थ्य कार्यदल हो-- लोक स्वास्थ्य प्रणाली में समस्त सेवाओं के लिए आवश्यक सभी पद एवं स्थान प्रर्याप्त रुप से सृजित किये जाएं एवं इन पदों को समय समय पर भरा जाये। संविदा में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित किया जाए तथा आशाओं , बहुउद्येशीय कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोक स्वास्थ्य तऩ्त्र के कर्मचारियों का प्रयाप्त रुप से क्षमता निर्माण किया जाए एवं उन्हें अपने कार्य के लिए सही मानदेय दिया जाए व उपयुक्त कार्य करने का माहौल प्रदान किया जाए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए तथा इस हेतू महिला कर्मचारियों के लिए विषेश व्यवस्था बनाई जाए। उपलब्ध शोध से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों की कमी पेशेवर समस्याओं से ज्यादा प्रशासनिक कमजोरी तथा राजनैतिक पराजय के चलते है, जिसके सुधारने के लिए कार्य किया जाए । हर स्तर के लिए ऐसे लोक स्वास्थ्य कैडर का गठन हो जिसमें प्रयाप्त संख्या में चिकित्सक, नर्सें तथा स्वास्थ्यर्किर्मयों का दल सम्मिलित हो जिसको प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, लोक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एवं एक दल के रुप में बेहतर कार्य करने में प्रशिक्षण प्राप्त हो।
10. हरयाणा में सभी आवश्यक दवाओं का एवं जांच सुविधाओं की मुफत एवं गुणवतापूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित हो। जिस प्रकार तामिलनाडू, केरल एवं राजस्थान राज्य में किया गया है वैसा स्वायत , पारदर्शी एवं आवश्यकता आाधारित दवा एवं अन्य सामग्रियों के लिए खरीदी एवं वितरण प्रणाली गठित एवं लागू हो। लंबित बीमारियों के सभी मरीजों के लिए सभी आवश्यक दवाओं का पूरी अवधि के लिए उपलब्धता सुनिश्चित हो एवं दवा वितरण केन्द्रों को मरीजों के आसान पहुंच के मद्येनजर गठित किया जाये। समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन एवं उपयोग को अनिवार्य करार दिया जाये।
11. हरयाणा में प्रत्येक स्तर पर सामुदायिक सहभागिता, सहभागी योजना निर्माण एवं समुदाय आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जाये। स्वास्थ्य सेवायें जनता के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए समुदाय आधारित निगरानी एवं योजना निर्माण प्रक्रिया को समस्त लोक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाये जिससे कि सेवा प्रदान में उतरदायित्व एवं पारदर्शिता बढे। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धन राशि के साथ साथ आवश्यक प्रबंधन स्वायतता भी प्राप्त हो।
12. हरयााणा की लोक स्वास्थ्य प्रणाली को भ्रष्टाचार मुक्त किया जायेः नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानान्तरण, खरीदी तथा अधोरचना विकास के लिए पारदर्शी नीतियां बनाई जायें तथा लागू की जाएं जिस प्रकार तामिलनाडू राज्य ने खरीदी के लिए तथा कर्नाटक राज्य ने स्थानान्तरण के लिए नीतियां बनाई हैं। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धनराशि के साथ साथ आवश्यक स्वायतता भी प्राप्त हो।
13. निजी अस्पतालों द्वारा किये जाने वाले शोषण को समाप्त किया जाये। राष्ट्रीय क्लिनिकल एस्टेब्लिश्मैंट एक्ट के अंर्तगत मरीजों के अधिकार हर संस्थाओं में सुरक्षित हों । विभिन्न सेवाओं के दाम नियंत्रित हों। प्रिस्क्रिप्शन , जांच तथा रेफरल के पीछे चलने वाली घूसखोरी को बंद किया जाए, एवं इसके लिए शासन द्वारा पर्यवेक्षित लेकिन स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाये। मानक निर्माण का प्रकार ऐसा हो जिसमें कारपोरेट हित का बढ़ावा न हो सके। इन तमाम व्यवस्थाओं पर यह भी विशेष ध्यान हो कि नैतिक एवं गैर वाणिज्यिक सेवा प्रदान करने वाले निजी प्रदाताओं को संपमूर्ण परिरक्षा मिल रहा है।
14. समस्त सार्वजनिक बीमा योजनाओं को समय सीमा के अन्र्तगत लोक सेवा व्यवस्था में विलीन किया जाये। आर एस बी वाई जैसे तथा अन्य राज्य संचालित बीमाएं कर-आधारित सार्वजनिक वितीय व्यवस्था से पोषित लोक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में समय सीमा के अंर्तगत विलीन हो । इन बीमा योजनाओं के अंर्तगत प्राप्त सभी सेवायें लोक स्वास्थ्य प्रणाली में भी सम्मिलित हों एवं इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लोक स्वास्थ्य प्रणाली में पूर्ण रुप से शामिल किया जाये जिससे कि उनके लिए समेकित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
15 . हरयाणा मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज ‘योजना’, जननी सुरक्षा योजना आदि सभी स्वास्थ्य योजनाओं को ठीक प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर सामाजिक संस्थाओं व जन संगठनों के कार्यकर्ताओं की एक माॅनिटरिंग कमेटी बनाई जाए जिसकी सिफारिशों पर सम्बंधित विभाग उचित कार्यवाही तुरन्त करे।
16 . हरयाणा से गुजरने वाले हाइवे पर एक्सीडैंट होने पर 48 घण्टे तक सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की योजना उचित ढंग से लागू की जाए।
17 . स्वास्थ्य नीतियों के विकास में तथा प्राथमिकतायें तय करने में बहुपक्षीय अंर्तराष्ट्रीय वितीय संस्थाओं का तकनीकी सहयोग पूर्ण रुप से समाप्त हो। विश्व बैंक,यू.एस.एड.,गेट्स फाउन्डेशन,कंसलटेंसी संस्थाएं जैसे डियोलाइट,मैकेन्सी आदि की राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकतांए एवं वितीय या सेवा प्रदाय रणनीतियों के निर्धारण में भूमिका को पूर्ण रुप से समाप्त किया जाये। शोध व ज्ञान संसाधन के विकास एवं वितरण के लिए एक विशेष अंर्तराष्ट्रीय सहयोग प्रणाली गठित की जाये , खासकर अन्य विकासशील देशों के साथ। डब्लू.एच. ओ. ,यूनिसेफ तथा अन्य संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं के उपर तकनीकी निर्भरता एवं उनकी वितिय सहायता की आवश्यकता से मुक्त किया जाने हेतू शासकीय स्तर पर दबाव बनें। इस प्रकार की संस्थाओं की ओर से आने वाले परामर्श तथा विशेषज्ञता को भी समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाये क्योंकि यह संस्थांए भी कारपोरेट एवं निजी संस्थानों के हित से प्रभावित हैं।
18 . राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर शोध एवं विकास के लिए क्षमता निर्माण हो। लोक स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर शोध के लिए आवंटित हो जिसमें स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध भी शामिल हो। स्वास्थ्य के क्षेत्र में तथा स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध हेतू नवीन संस्थागत ढांचे शासन द्वारा गठित हों तथा मौजूदा संस्थाओं को प्रयाप्त शासकीय वितिय सहायता दी जाये।
19 . आवश्यक एवं सुरक्षित दवाईयों तथा उपकरणों की सही उपलब्धता सुनिश्चित हो। सभी दवाईयों का मूल्य आधारित दाम नियन्त्रण हो , दवा एवं उपकरण सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रावधान हो। जेनेरिक दवाईयों के वितरण के लिए प्रयाप्त सुंविधायें लागू हों व चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाईयों के प्रिस्क्रिप्शन हेतू अनिवार्यता हो। इंडियन पेटैंट एक्ट के अंर्तगत लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं का दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उपयोग हो तथा ज्यादातर दवाईयों एवं उपकरणों के देशी निर्माण को बढावा मिले।
20 . जैव चिकिस्तकीय शोध तथा क्लिनिकल ट्रायलों की सशक्त विनियामक व्यवस्था हो। क्लिनिकल ट्रायलों के नैतिक संचालन हेतू स्पष्ट रुप रेखा तैयार एवं लागू हो जिससे समस्त हितग्राहियों के सशक्त विनियम के लिए व्यवस्थायें बंधित हों चाहे वे वितीय प्रदाता हों ,शोध संस्थाएं हों या नैतिक समितियां हों। सी.डी.एस.सी.ओ. तथा आई.सी. एम. आर. द्वारा समस्त क्लिनिकल ट्रायलों की तथा ट्रायल स्थानों की सशक्त निगरानी की जाये तथा ट्रायल संस्थानों के आंवटन के दौरान वहां पर आवश्यक सभी आपातकालीन स्थिति के निपटारे हेतू व्यवस्थायें सुनिश्चित हों । क्लिनिकल ट्रायलों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रयाप्त क्षतिपूर्ण राशि उपलब्ध कराने हेतू एवं उनको हो सकने वाले समस्त बुरे प्रभाव निपटारे के लिए प्रयाप्त व्यवस्था के साथ निर्देष विकसित और लागू हों। क्लिनिकल ट्रायल प्रतिभागियों के लिए उनके अधिकार पत्र विकसित किये जायें जिसकी कानूनी रुप में भी वैधता हो।
21 . हरयाणा के सभी मानसिक रुप से पीड़ित मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं एवं रक्षा सुनिश्चित की जायें। जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंर्तगत शामिल किया जाये। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति पर अमल हो तथा मानसिक स्वास्थ्य कानून पास किया जाये।
22 . हरयाणा में कीटनाशक दवाओं के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के चलते हर क्षेत्र--मानवीय, पशु व खेती में इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मानवीय स्तर पर इन कीटनाशकों की मात्रा पता लगाने के टैस्टों की सुविधा इस प्रदेश के इकलौते पीजीआईएमएस में भी नहीं है। कई तरह की बीमारियां इसके चलते बढ़ रही हैं या पैदा हो रही हैं। यह सुविधा तत्काल मुहैया करवाई जाए।
23 . हरयाणा के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर - एक सर्जन, एक फिजिसियन, एक शिशु रोग विशेषज्ञ व एक महिला रोग विशेषज्ञ के प्रावधान के मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा तय किये गए हैं। इसके साथ यदि मरीज बेहोशी का विशेषज्ञ नहीं है तो सर्जन और गायनकाॅलोजिस्ट तो अपंग हो जाते हैं। इसलिए इन पांचों विशेषज्ञों की नियुक्तियां प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में की जाए।
24 . हरयाणा प्रदेश के जिलों में गुड़गांव, रोहतक, हिसार, भिवानी,फरीदाबाद और सोनीपत में विशेष आर्थिक पैकेज के तहत 1500 करोड़ रुपये की परियोजनांए शुरू की गइ्र हैं जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए इन जिलों के अस्पतालों को अपग्रेड करके सुपर स्पैशिलिटी अस्पताल बनाये जा रहे हैं। बहुत ही हाईटेक उपकरण पिछले सालों में खरीदे गए जो बहुत कम जगह और कमतर स्तर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। यहां पर उपयुक्त स्टाफ की कमी को पूरा करते हुए इसके लिए सम्बंधित विशेषज्ञों, डाॅक्टरों, नर्सों व पैरामैडिकल स्टाफ को उपयुक्त ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। निशुल्क सर्जीकल पैकेज योजना के तहत 2009 से बी. पी. एल परिवारों को दी जा रही निशुल्क सर्जरी
की सेवा को लागू करने में आ रही सभी दिक्कतों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जायें। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व अधि सूचित झोंपड़ पट्टियों एवं बस्तियों के निवासियों के सभी आपरेशन मुफत करने की योजना को सही ढंग से लागू किया जाए । इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना 26 जनवरी 2010 से लागू की गई। जिसके तहत अठारह वर्ष तक की आयु के बच्चों के स्वास्थ्य कार्ड बना कर सरकारी अस्पतालों में उनके स्वास्थ्य की निशुल्क जांच व ईलाज किया जाता है। बहुत से लोगों को इन सब योजनाओं से वाकिफ ही नहीं करवाया गया लगता और इनके क्रियान्वयन की दिक्कतों को भी दुरुस्त करने के कदम पहले सुझाये गये माध्यमों के द्वारा उठाये जायें। प्रदेश में 2005 तक एम. बी.बी.एस.की कुल सीटें 350 थी जो वर्श 2013 में 850 हो गई। मगर इन विद्यार्थियों की गुणवता पूर्ण मैडीकल शिक्षा के लिए जरुरी फैकल्टी की काफी कमी हैं । साथ ही हरेक मैडीकल कालेज में इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है जिसे पूरा करना बड़ी चुनौती है।
25 . राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दाल रोटी योजना को सही सही लागू किया जाए।
26 . कुपोषण ---नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार हरियाणा में बढ़ा है। इसके लिए कारगर कदम उठाये जायें। इसी प्रकार गर्भवती महिलाओं में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे दो के मुकाबले 10 प्रतिशत खून की कमी बढ़ी है। इसके साथ-साथ लड़कियों में किये गये सरकारी सर्वे में भी खून की कमी का प्रतिशत काफी पाया गया है। उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है।
27 . पी एन डी टी एक्ट के तहत उचित कार्यवाही की जाएं।

रविवार, 21 सितंबर 2014

जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा

जन स्वास्थ्य अभियान हरियाणा

हमारे संसार के पूरे इतिहास में सभी की सभी सभ्यताएं बीमारी और रुगण्ता के खतरों के साथ पली हैं। हम देख और जान सकते हैं कि प्रत्येक सभ्यता ने इस हकीकत से निपटने के समयानुसार अपने अपने तरीके ईजाद किये, मगर रोग मुक्त जीवन का सपना तो पिछली दो सदियों से ही देखा जाने लगा है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के विकास से हमें बीमारी की प्रक्रिया में सक्रिय हस्तक्षेप के औजार मिले किन्तु आधुनिक चिकित्सा प्रणाली के शुरूआती पुलाव के बाद चिन्ताएं भी पैदा हुई हैं। पिछले सालों में भारत की स्वास्थ्य सम्बंधी स्थिति में कई अहम बदलाव आये हैं। पिछले दशकों में दवाइयों और कीटनाशकों के विरूद्ध प्रतिरोध की समस्या उभरी हैं और संक्रामक व परजीवी जनित बीमारियों ने फिर से सिर उठाया है। जैनेटिक खोजों के कारण उपजी बीमारियों का दायरा बढ़ा है और एडस का नया खतरा तो मुँह बाये खड़ा ही है। इस सबसे लड़ने के लिए जिस तरह के बदलाव की जरूरतें हैं वह नहीं हो पा रही हैं।
         इसको ठीक करने के वास्ते दरकार तो समाज के ढांचे में बदलाव की थी मगर जो असल में हुआ वह है ढांचागत समायोजन। हमारे देश भारत में सन 1991 में ढांचागत समायोजन कार्यक्रम को अपनाया गया। हमें यही कहा गया कि हमारी ‘कमजोर’ अर्थव्यवस्था में यह एक जान फूंकने का प्रयास है। ‘विश्व बैंक’ और ‘मुद्रा कोष’ द्वारा थोंपी गई शर्तों के अधीन देश की आर्थिक नीति में व्यापक बदलाव किये गये हैं और किये जा रहे हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में जरूरी दवाओं सम्बन्धी नियंत्रण खत्म किये गये, सरकारी अस्पतालों में सेवा शुल्क वसूली लागू करने के प्रयास किये गये, स्वास्थ्य पर होने वाले सरकारी खर्च में कटौती जारी है, इसके साथ-साथ निजीकरण को बढ़ावा बेइन्तहा दिया जा रहा है। कारपोरेट सैक्टर द्वारा संचालित बीमा कम्पनियों के माध्यम से सभी के लिए स्वास्थ्य का नारा लाने की पुरजोर कोशिशें  की जा रही हैं।
'सन 2000 तक सबके लिए स्वास्थ्य’ का नारा जिस जोशो-खरोश से उछाला गया था, कुछ दिन उसे फुस फुसाया गया और अब तो बहुत से लोग नाम लेना भी भूल गये । इसके एवज में अब ‘चुनिंदा’ प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को ही एकमात्र विकल्प बताकर पेश किया जा रहा है। ऐसी हालत में यह और भी जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्य सम्बन्धी बहस को एक बार फिर से नये सिरे से छेड़ा जाए और इसकी समीक्षा की जाए। अन्यायपूर्ण नीतियों को रोकना और संसाधनों व सता के असमान वितरण के प्रयासों का विरोध लोगों की संगठित ताकत से ही संभव है। लोगों का स्वास्थ्य एक अहम मुद्दा होते हुए भी उनका सामुहिक मुद्दा नहीं बन सका है।
           स्वास्थ्य सभी नागरिकों के लिए एक मौलिक एवं सार्वभौमिक अधिकार है। इस अधिकार के साथ साथ सवास्थ्य के उन निर्णायक मुद्यों व अर्न्तखण्डीय कारकों जैसे अच्छा भोजन, सुरक्षित साफ पीने योग्य पानी, बेहतर सफाई सुरक्षा व्यवस्था, बेहतर रहन सहन व खान पान, रोजगार, प्रदूशण रहित वातावरण व खाद्य पदार्थ, लिंग जाति व वर्ग आधारित असमानता का निवारण, सभी के लिए स्तरीय व गुणवतापूर्ण षिक्षा, सामाजिक न्याय तथा वर्तमान बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की सभी के लिए उपलब्धता आदि की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। महज ‘थ्री  डी-डाक्टर,डिजीज और डरग्ज-’ के पैमाने से स्वास्थ्य के मुद्दे को नहीं देखा जाना चाहिये और न ही इसे बाजार व्यवस्था में मुनाफे के रुप में देखा जाना चाहिये। खासतौर से तुरन्त लाभ हानि की नजर से नीति निर्धारकों  को भी नहीं देखना चाहिये। दुर्भाग्य है हमारा कि हम इन संकीर्ण दायरों में ही स्वास्थ्य के मुद्दे को देख रहे हैं।
            समेकित स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं भी स्वास्थ्य के अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इस अधिकार को पूर्ण करने के लिए हमारी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर संसाधनों से युक्त करने की , उसे विस्तारित करने की तथा उसे जवाब देह बनाने की  है जिससे  देश  की समस्त जनता  के  साथ में हरयाणा की जनता को मुफत , समेकित, उच्च गुणवता पूर्ण तथा आसानी से उपलब्ध स्वास्थ्य रक्षा सेवाएं प्रदान की जा सकें।
सरकारी ढांचे में स्वास्थ्य सेवाओं में जरुरत के हिसाब से 76 प्रतिशत डाक्टरों और 53 प्रतिशत नर्सों की कमी है।(आर एच एस) इसके साथ ही प्रयोगशालाओं में तकनीशियनों की 80 प्रतिशत और एक्सरे कर्मीयों की 85 प्रतिशत कमी है। यह राष्ट्रीय  आंकडे़ हैं। हरियाणा के आंकड़े भी ज्यादा भिन्न नहीं हैं।
-टेबल-
जिला स्तरीय हॉस्पीटल की संख्या----2010--------21
कुल  गांव की संख्या---2010-----------------6955
सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010-------107..111
सब डिस्ट्रिक्ट  हॉस्पीटल की संख्या---2010 ............25
सब सैंटरों की संख्या----2010----------------2484
प्राथमिक सवास्थ्य केन्द्रों की संख्या---2010--------441
        स्वास्थ्य सुविधाएं, मध्यम दर्जे के कार्यकर्ताओं पर टिकी हैं - नर्सें, ए.एन.एम. (दाइयां) और पैरा मैडीकल कर्मचारी (अर्द्ध चिकित्सा कर्मी)। ये कार्यकर्ता ही लोगों की सामाजिक आर्थिक समस्याओं के सम्पर्क में आते हैं। परन्तु खुद के स्वास्थ्य क्षेत्र के काम के विश्लेषण में इनकी भागीदारी न के बराबर है। पहली बात तो यह है कि निचले दर्जे में होने के कारण इनसे सिर्फ आदेशों के पालन करने की अपेक्षा की जाती है, निर्णयों में इनकी कोई भागीदारी नहीं होती है। दूसरी बात यह है कि इन्हें यदि निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बना लिया जाए तो इनकी ट्रेनिंग इस तरह की नहीं हुई है कि ये अपने व्यवहारिक अनुभवों से अवधारणा या विचार विकसित कर सकें या अवधारणाओं को व्यवहार में बदल सकें।
           जानकारी अपने आप बदलाव नहीं लाती। परन्तु जानकारी बदलाव की एक पूर्ण शर्त जरूर है। ‘समाज और स्वास्थ्य’ के माध्यम से देश में और हरियाणा में ‘जन स्वास्थ्य अभियान’ की यह कोशिश है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में हो रहे विकास के ताजा घटनाक्रम को शामिल करके लोगों तक पहुँचा जाए ताकि हम सबको वर्तमान की झलक मिल सके और स्वास्थ्य सेवाओं तथा स्वास्थ्य के क्षेत्र में जन पक्षीय आधार को मजबूत किया जा सके।
इस उपलक्ष्य में निम्नवत प्रस्ताव रखे जाते हैं जो कि मौजूदा स्वास्थ्य परीस्थिति, जो कि पूर्णरुप से खारीज करने लायक है, को पलट सकें तथा स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाली परिस्थितियां तथा स्वास्थ्य सेवाएं लागू करते हुए सबके लिए स्वास्थ्य का सपना साकार कर सकें।
1. हरयााणा में स्वास्थ्य के सामाजिक नियामकों पर ध्यान बहुत आवश्यक हो गया है- इसके अर्न्तगत स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना , लोक वितरण प्रणाली को सार्वभौमिक बनाना होगा जिसके तहत स्थानीय खाद्य पदार्थों को बढ़ावा दिया  जाये । राष्ट्रीय शिशु  स्वास्थ्य एवं पोषण नीति बनाई जाए जिसके अर्न्तगत आई.सी.डी.एस. का सार्वभौमिकी करण हो व तीन साल तक के बच्चों को पूर्ण रुप से शामिल करने हेतू सेवाओं तथा कार्यदल में विस्तार हो। समस्त गावों व मोहल्लों में शुद्ध  एवं सुरक्षित पेयजल की सार्वभौमिक उपलब्धता हो तथा हर गांव व मोहल्ले में स्वच्छ षौचालयों तक सार्वभौमिक पहुंच हो।
2. हरयाणा में महिलाओं की स्थिति विचारणीय है। यहां स्वास्थ्य सम्बन्धित लैंगिक पहलूओं को सम्बोधित किया जाना आवश्यक  है -इसके अंर्तगत समस्त महिलाओं तथा समलैंगिक नागरिकों को समेकित , आसानी से उपलब्ध उच्चगुणवतापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच व इसकी उपलब्धता की गारण्टी दी जाए जो कि केवल मातृत्व सवास्थ्य सेवाओं तक ही सीमित न हो। उन समस्त कानून ,नीतियों तथा आाचरणों को समाप्त किया जाए जो कि महिलाओं के प्रजनन, यौनिक तथा जनतांन्त्रिक अधिकारों का हनन करता है। उन विभिन्न प्रजनन प्रोद्योगिकियांे को जो कि महिलाओं के लिए हानिकारक हो सकती हैं , नियंत्रित किया जाए । लिंग आधारित उत्पीड़न को एक लोक स्वास्थ्य समस्या माना जाए तथा इसके तहत षारीरिक एवम मानसिक रुप से पीड़ितों को तमाम आवष्यक स्वास्थ्य जांच, दस्तावेजिकरण, रेफरल का अधिकार दिया जाए तथा समन्वित नैतिक चिकित्सीय कानूनी प्रक्रियाओं के लिए भी उन्हें अधिकृत बनाया जाए । स्वास्थ्य सेवाओं को किषोर किषोरियों के लिए मित्ऱतापूर्ण बनाया जाए तथा इस तबके को भी समेकित, उच्चगुणवता पूर्ण , आासनी से पहुंचने लायक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिष्चित हो जो कि उनके  विशेष प्रजनन तथा यौनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करती हों।
3. हरयाणा में जाति समीकरण बढा है। समस्त जाति आधारित भेदभाव तुरंत समाप्त किया जाए- जाति आधारित भेदभावों को, जो कि बुरे स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण सामाजिक कारक है , पूर्णरुप से समाप्त करने हेतू त्वरित एवं प्रभावी कदम उठाये जाएं। मानव द्वारा मैला ढोने वाले समस्त मैनुअल कार्य पूर्ण रुप से प्रतिबन्धित हों। स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में इस भेदभाव से पीड़ित तबकों को प्राथमिकता दी जाए । इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं का पुर्नगठन किया जाए।
4. हरयाणा में स्वास्थ्य सेवाओं के अधिकार को संवैधानिक बनाया जाए- देष में और प्रदेष में स्वास्थ्य के अधिकार का कानून लागू किया जाए जो कि समेकित, उच्चगुणवतापूर्ण, आसानी से उपलब्ध सेवाओं को सुनिष्चित करता हो तथा प्राथमिक, द्वितीय एवं तृतीय स्तरीय सेवायें आवश्यकतानुसार  सबको उपलब्ध करता हो। सेवा प्रदाता को सेवाओं को उपलब्ध नहीं कराने या मना करने पर ;चाहे गुणवता,पहुंच या खर्च से जुड़े हुए कारणों से भी हो, उसे कानूनी अपराध घोषित किया जाए।
5. हरयाणा में स्वास्थ्य के उपर सार्वजनिक व्यय को बढ़ाया जाए-सकल घरेलू उत्पाद के कम से कम 3. 6 प्रतिशत को स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित किया जाए जो कि 2014 की स्थिति में प्रति व्यक्ति 3000 रुपये बनता है।
इस व्यय में कम से कम एक तिहाई केन्द्रिीय सरकार से राज्यों को उपलब्ध हो। हरियाणा सरकार का प्रति व्यक्ति खर्च 1786 के लगभग है। एक मध्य सीमा के तहत स्वास्थ्य के उपर किये जाने वाले समस्त सार्वजनिक व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 5 प्रतिशत तक बढ़ाया जाए।
6. हरयाणा के प्रत्येक जिले में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता एवं गुणवता सुनिष्चित की जाए-समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में सेवाओं की गुणवता सुनिश्चित  की जाए जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावी , सुरक्षित , गैरशोषणीय  बनायें तथा लोगों को सम्मानपूर्वक सेवायें उपलब्ध हों। मरीजों के अधिकारों का आदर हो एवं मरीजों की आराम तथा संतुश्टि पर ध्यान दिया जाता हो। गुणवता का मानक केवल भौतिक या चिकित्सकीय संरचना पर आधारित न हो जो कि प्रायः बड़े कार्पोरेट अस्पतालों या मैडीकल टूरिज्म के लोग को बढ़ावा देते हैं तथा यह कम खर्च में सही एवं प्रभावी सेवाओं के प्रदाय को बढ़ावा नहीं देता है। समस्त लोक स्वास्थ्य संस्थान अपने स्तर पर गारन्टी की गई सभी स्वास्थ्य सेवाओं को प्रदान करने हेतू बाध्य हों। समस्त लोक स्वास्थ्य सुविधाओं को किसी भी प्रकार के उपभोग्ता शुल्क  से मुक्त किया जाए तथा सेवाएं शासन द्वारा संचालित सुविधाओं के माध्यम से उपलब्ध कराई जाएं न कि निजी सार्वजनिक सहयोग व्यवस्था से।
7. हरयाणा में स्वास्थ्य सेवाओं का सक्रीय एवं निष्क्रिय   निजीकरण बंद हो- सक्रीय निजीकरण के तरीके ; जैसे सार्वजनिक संसाधन या पूंजी को निजी संस्थानों को वाणिज्यिक तौर पर हस्तानन्तरण करना ,पूर्ण रुप से बंद करने हेतू आवश्यक  कदम उठाया जाएं। निष्क्रिय रुप से हो रहे निजीकरण को रोकने के लिए लोक सुविधाओं में निवेश  बढ़ाया जाए। सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों से प्रदत सेवाएं केवल प्रजनन स्वास्थ्य,टीकाकरण एवं अन्य चुनिन्दा बीमारियों के नियन्त्रण पर सीमित न होकर समेकित स्वास्थ्य सेवाओं पर आधारित हों।
8. हरयाणा के स्वास्थ्य कार्यदल का बेहतर प्रशिक्षण होः स्वास्थ्य सेवाओं में कार्यरत सभी कर्मचारियों की बेहतरीन शिक्षा एवं प्रशिक्षण के लिए सार्वजनिक निवेश  को बढ़ाया जाए। सरकार द्वारा चलायी जा रही सभी शिक्षण संस्थानों द्वारा उन जरुरत मंद इलाकों से चिकित्सकों, नर्सों तथा स्वास्थ्य कर्मचारियों को आवश्यक संख्या  में चयनित कर  शिक्षा प्रशिक्षण  दिया जा रहा है यह सुनिश्चित  किया जाए।प्रशिक्षण नीति में बदलाव लाया जाए जिससे कि स्वास्थ्य कार्यदल द्वारा स्थानीय   आवश्यकताओं  को पूरा करने हेतू समस्त जरुरी दक्षताएं दी जा सकें। चिकित्सा तथा संबन्धित क्षेत्र के उच्च शिक्षा व्यवस्था के वाणिज्यिकरण बंद हों तथा निजी शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थित नियन्त्रण हेतू प्रभावी एवं पारदर्शी तन्त्र लागू किया जाए।भारतीय चिकित्सा परिषद,भारतीय नर्सिंग परिषद जैसी संस्थाओं व दूसरी विनियामक संस्थाओं को गहन समीक्षा के पश्चात  पुनर्गठित किया जाए जिससे कि वर्तमान भ्रष्ट  एवं अनैतिक व्यवस्था को समाप्त किया जा सके।
9. बेहतर  शासित ,प्रयाप्त लोक स्वास्थ्य कार्यदल होः लोक स्वास्थ्य प्रणाली में समस्त सेवाओं के लिए आवश्यक  सभी पद एवं स्थान प्रर्याप्त रुप से सृजित किये जाएं एवं इन पदों को समय समय पर भरा जाये। संविदा (ठेकेदारी) में नियुक्त कर्मचारियों को नियमित किया जाए तथा आशाओं , बहुउद्येषीय कार्यकर्ताओं तथा अन्य लोक स्वास्थ्य तऩ्त्र के कर्मचारियों का प्रयाप्त रुप से क्षमता निर्माण किया जाए एवं उन्हें अपने कार्य के लिए सही मानदेय दिया जाए व उपयुक्त कार्य करने का माहौल प्रदान किया जाए। कर्मचारियों के स्वास्थ्य एवं सुरक्षा पर ध्यान दिया जाए तथा इस हेतू महिला कर्मचारियों के लिए विषेश व्यवस्था बनाई जाए। उपलब्ध शोध से यह पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्र में डाक्टरों की कमी पेशेवर समस्याओं से ज्यादा प्रशासनिक कमजोरी तथा राजनैतिक पराजय के चलते है, जिसके सुधारने के लिए कार्य किया जाए । हर स्तर के लिए ऐसे लोक स्वास्थ्य कैडर का गठन हो जिसमें प्रयाप्त संख्या में चिकित्सक, नर्सें तथा स्वास्थ्यर्किर्मयों का दल सम्मिलित हो जिसको प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में, लोक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में एवं एक दल के रुप में बेहतर कार्य करने में प्रषिक्षण प्राप्त हो।
10. हरयाणा में सभी आवश्यक  दवाओं का एवं जांच सुविधाओं की मुफत एवं गुणवतापूर्ण उपलब्धता सुनिश्चित  होः जिस प्रकार तामिलनाडू, केरल एवं राजस्थान राज्य में किया गया है वैसा स्वायत , पारदर्शी  एवं आवश्यकता  आाधारित दवा एवं अन्य सामग्रियों के लिए खरीदी एवं वितरण प्रणाली गठित एवं लागू हो। लंबित बीमारियों के सभी मरीजों के लिए सभी जरूरी  दवाओं का पूरी अवधि के लिए उपलब्धता सुनिश्चित  हो एवं दवा वितरण केन्द्रों को मरीजों के आसान पहुंच के मद्येनजर गठित किया जाये। समस्त स्वास्थ्य सुविधाओं में जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन  एवं उपयोग को अनिवार्य करार दिया जाये।
11. हरयाणा प्रत्येक स्तर पर सामुदायिक सहभागिता, सहभागी योजना निर्माण एवं समुदाय आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जायेः स्वास्थ्य सेवायें जनता के प्रति जवाबदेह हों। इसके लिए समुदाय आधारित निगरानी एवं योजना निर्माण प्रक्रिया को समस्त लोक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं सेवाओं का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाये जिससे कि सेवा प्रदान में उतरदायित्व एवं पारदर्शिता  बढे। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धन राशि  के साथ साथ आवश्यक  प्रबंधन स्वायतता भी प्राप्त हो।
12. हरयााणा की लोक स्वास्थ्य प्रणाली को भ्रष्टाचार  मुक्त किया जायेः नियुक्ति, पदोन्नति, स्थानान्तरण, खरीदी तथा अधोरचना विकास के लिए पारदर्शी  नीतियां बनाई जायें तथा लागू की जाएं जिस प्रकार तामिलनाडू राज्य ने खरीदी के लिए तथा कर्नाटक राजय ने स्थानान्तरण के लिए नीतियां बनाई हैं। शिकायत निवारण की प्रक्रियाओं को सुचारु रुप से चलाने के लिए संस्थागत व्यवस्थायें बनाई जायें जिसके लिए प्रयाप्त धनराशि  के साथ साथ आवष्यक स्वायतता प्राप्त भी हो।
13. निजी अस्पतालों द्वारा किये जाने वाले शोषण  को समाप्त किया जायेः राष्ट्रीय  क्लिनिकल एस्टेब्लिष्मैंट एक्ट के अंर्तगत मरीजों के अधिकार हर संस्थाओं में सुरक्षित हों । विभिन्न सेवाओं के दाम नियंत्रित हों। प्रिस्क्रिप्शन , जांच तथा रेफरल के पीछे चलने वाली घूसखोरी को बंद किया जाए, एवं इसके लिए शासन द्वारा पर्यवेक्षित लेकिन स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था लागू की जाये। मानक निर्माण का प्रकार ऐसा हो जिसमें कारपोरेट हित का बढ़ावा न हो सके। इन तमाम व्यवस्थाओं पर यह भी विषेश ध्यान हो कि नैतिक एवं गैर वाणिज्यिक सेवा प्रदान करने वाले निजी प्रदाताओं को संपमूर्ण परिरक्षा मिल रहा है।
14. समस्त सार्वजनिक बीमा योजनाओं को समय सीमा के अर्न्तगत लोक सेवा व्यवस्था में विलीन किया जायेः आर एस बी वाई जैसे तथा अन्य राज्य संचालित बीमाएं कर-आधारित सार्वजनिक वितीय व्यव्स्था से पोशित लोक स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था में समय सीमा के अंर्तगत विलीन हो । इन बीमा योजनाओं के अंर्तगत प्राप्त सभी सेवायें लोक स्वास्थ्य प्रणाली में भी सम्मिलित हों एवं इसके लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हों। संगठित एवं असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को लोक स्वास्थ्य प्रणाली में पूर्ण रुप से शामिल किया जाये जिससे कि उनके लिए समेकित स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो।
हरयाणा मुख्यमंत्री मुफ्त इलाज ‘योजना’, जननी सुरक्षा योजना आदि सभी स्वास्थ्य योजनाओं को ठीक प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए जिला स्तर पर सामाजिक संस्थाओं व जन संगठनों के कार्यकर्ताओं की एक मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए जिसकी सिफारिशों पर सम्बंधित विभाग उचित कार्यवाही तुरन्त करे। हरयाणा से गुजरने वाले हाइवे पर एक्सीडैंट होने पर 48 घण्टे तक सभी को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने की योजना उचित ढंग से लागू की जाए।
15. स्वास्थ्य नीतियों के विकास में तथा प्राथमिकतायें तय करने में बहुपक्षीय अंर्तराष्ट्रीय  वितीय संस्थाओं का तकनीकी सहयोग पूर्ण रुप से समाप्त होः विश्व  बैंक,यू.एस.एड.,गेट्स फाउन्डेशन ,कंसलटेंसी संस्थाएं जैसे डियोलाइट,मैकेन्सी आदि  की राष्ट्रीय  स्वास्थ्य प्राथमिकतांए एवं वितीय या सेवा प्रदाय रणनीतियों के निर्धारण में भूमिका को पूर्ण रुप से समाप्त किया जाये। शोध  व ज्ञान संसाधन के विकास एवं वितरण के लिए एक विशेष  अंतर्राष्ट्रीय  सहयोग प्रणाली गठित की जाये , खासकर अन्य विकासशील  देशों  के साथ। डब्लू.एच. ओ. ,यूनिसेफ तथा अन्य संयुक्त राष्ट्र  संस्थाओं के उपर तकनीकी निर्भरता एवं उनकी वितिय सहायता की आवश्यकता  से मुक्त किया जाने हेतू शासकीय स्तर पर दबाव बनें। इस प्रकार की संस्थाओं की ओर से आने वाले परामर्श  तथा विशेषज्ञता  को भी समीक्षात्मक दृष्टि  से देखा जाये क्योंकि यह संस्थांए भी कारपोरेट एवं निजी संस्थानों के हित से प्रभावित हैं।
16. राष्ट्रीय  एवं राज्य स्तर पर स्वास्थ्य पर शोध एवं विकास के लिए क्षमता निर्माण होः लोक स्वास्थ्य बजट का कम से कम 5 प्रतिशत स्वास्थ्य पर शोध के लिए आवंटित हो जिसमें स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध भी शामिल हो। स्वास्थ्य के क्षेत्र में तथा स्वास्थ्य तन्त्रों पर शोध  हेतू नवीन संस्थागत ढांचे शासन द्वारा गठित हों तथा मौजूदा संस्थाओं को प्रयाप्त शासकीय वितिय सहायता दी जाये।
17. आवश्यक  एवं सुरक्षित दवाईयों तथा उपकरणों की सही उपलब्धता सुनिश्चित  होः सभी दवाईयों का मूल्य आधारित दाम नियन्त्रण हो , दवा एवं उपकरण सुरक्षा के लिए आवश्यक  प्रावधान हो। जेनेरिक दवाईयों के वितरण के लिए प्रयाप्त सुंविधायें लागू हों व चिकित्सकों द्वारा जेनेरिक दवाईयों के प्रिस्क्रिप्शन  हेतू अनिवार्यता हो। इंडियन पेटैंट एक्ट के अंर्तगत लोक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए की गई व्यवस्थाओं का दवाईयों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए उपयोग हो तथा ज्यादातर दवाईयों एवं उपकरणों के देषी निर्माण को बढावा मिले।
18. जैव चिकिस्तकीय षोध तथा क्लिनिकल ट्रायलों की सशक्त  विनियामक व्यवस्था होः क्लिनिकल ट्रायलों के नैतिक संचालन हेतू स्पष्ट  रुप रेखा तैयार एवं लागू हो जिससे समस्त हितग्राहियों के सशक्त  विनियम के लिए व्यवस्थायेंबंधित हों चाहे वे वितीय प्रदाता हों  ,शोध  संस्थाएं हों या नैतिक समितियां हों। सी.डी.एस.सी.ओ. तथा आई.सी. एम. आर. द्वारा समस्त क्लिनिकल ट्रायलों की तथा ट्रायल स्थानों की सशक्त  निगरानी की जाये तथा ट्रायल संस्थानों के आंवटन के दौरान वहां पर आवश्यक  सभी आपातकालीन स्थिति के निपटारे हेतू व्यवस्थायें सुनिश्चित  हों । क्लिनिकल ट्रायलों में भाग लेने वाले प्रतिभागियों को प्रयाप्त क्षतिपूर्ण राशि  उपलब्ध कराने हेतू एवं उनको हो सकने वाले समस्त बुरे प्रभाव निपटारे के लिए प्रयाप्त व्यवस्था के साथ निर्देश  विकसित और लागू हों। क्लिनिकल ट्रायल प्रतिभागियों के लिए उनके अधिकार पत्र विकसित किये जायें जिसकी कानूनी रुप में भी वैधता हो।
19. हरयाणा के सभी मानसिक रुप से पीड़ित मरीजों को स्वास्थ्य सेवाएं एवं रक्षा सुनिष्चित की जायेंः जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम को राष्ट्रीय  स्वास्थ्य मिशन  के अंर्तगत शामिल किया जाये। राष्ट्रीय  मानसिक स्वास्थ्य नीति पर अमल हो तथा मानसिक स्वास्थ्य कानून पास किया जाये।
20. हरयाणा में कीटनाशक दवाओं के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के चलते हर क्षेत्र, मानवीय, पशु व खेती में इसके दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि मानवीय स्तर पर इन कीटनाशकों की मात्रा पता लगाने के टैस्टों की सुविधा इस प्रदेश के इकलौते पीजीआईएमएस में भी नहीं है। कई तरह की बीमारियां इसके चलते बढ़ रही हैं या पैदा हो रही हैं। यह सुविधा तत्काल मुहैया करवाई जाए।
21. हरयाणा के सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर - एक सर्जन, एक फिजिसियन, एक शिशु रोग विशेषज्ञ व एक महिला रोग विशेषज्ञ के प्रावधान के मानक केन्द्रीय स्वास्थ्य विभाग द्वारा तय किये गए हैं। इसके साथ यदि मरीज बेहोशी का विशेषज्ञ नहीं है तो सर्जन और गायनकॉलोजिस्ट तो अपंग हो जाते हैं। इसलिए इन पांचों विशेषज्ञों की नियुक्तियां प्रत्येक सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में  की जाए।
22. हरयाणा प्रदेश के जिलों में गुड़गांव, रोहतक, हिसार, भिवानी,फरीदाबाद और सोनीपत में विशेष  आर्थिक पैकेज के तहत 150 करोड़ रुपये की परियोजनांए शुरू  की गइ्र हैं जिसके तहत स्वास्थ्य सेवाओं के आधारभूत ढांचे को विकसित करने के लिए इन जिलों के अस्पतालों को अपग्रेड करके सुपर स्पैशिलिटी अस्पताल बनाये जा रहे हैं। बहुत ही हाईटेक उपकरण पिछले सालों में खरीदे गए जो बहुत कम जगह और कमतर स्तर पर इस्तेमाल किये जा रहे हैं। यहां पर उपयुक्त स्टाफ की कमी को पूरा करते हुए इसके लिए सम्बंधित विशेषज्ञों, डॉक्टरों, नर्सों व पैरामैडिकल स्टाफ को उपयुक्त ट्रेनिंग देने की भी आवश्यकता है। निशुल्क  सर्जीकल पैकेज योजना के तहत 2009 से बी. पी. एल परिवारों को दी जा रही निशुल्क  सर्जरी की सेवा को लागू करने में आ रही सभी दिक्कतों को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जायें। गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व अधि सूचित झोंपड़ पट्टियों एवं बस्तियों के निवासियों के सभी आपरेषन मुफत करने की योजना को सही ढंग से लागू किया जाए । इंदिरा बाल स्वास्थ्य योजना 26 जनवरी 2010 से लागू की गई। जिसके तहत अठारह वर्ष  तक की आयु के बच्चों के स्वास्थ्य कार्ड बना कर सरकारी अस्पतालों में उनके स्वास्थ्य की निशुल्क  जांच व ईलाज किया जाता है। बहुत से लोगों को इन सब योजनाओं से वाकिफ ही नहीं करवाया गया लगता और इनके क्रियान्वयन की दिक्कतों को भी दुरुस्त करने के कदम पहले सुझाये गये माध्यमों के द्वारा उठाये जायें। प्रदेश  में 2005 तक एम. बी.बी.एस.की कुल सीटें 350 थी जो वर्श 2013 में 850 हो गई। मगर इन विद्यार्थियों की गुणवता पूर्ण मैडीकल शिक्षा के लिए जरुरी फैकल्टी की काफी कमी हैं । साथ ही हरेक मैडीकल कालेज में इन्फ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है जिसे पूरा करना बड़ी चुनौती है।
23. राष्ट्रीय  खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 के तहत दाल रोटी योजना को सही सही लागू किया जाए।
24. कुपोषण ;नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन  के अनुसार हरियाणा में बढ़ा है। इसके लिए कारगर कदम उठाये जायें। इसी प्रकार गर्भवती महिलाओं में नैशनल फैमिली हैल्थ सर्वे तीन के अनुसार नैषनल फैमिली हैल्थ सर्वे दो के मुकाबले 10 प्रतिशत खून की कमी बढ़ी है। इसके साथ-साथ लड़कियों में किये गये सरकारी सर्वे में भी खून की कमी का प्रतिशत काफी पाया गया है। उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है।
25. पी एन डी टी एक्ट के तहत उचित कार्यवाही की जाएं।
संयोजक ... सतनाम....09466290728

Manifesto to promote health and healthcare in Haryana:

Manifesto to promote health and healthcare in Haryana:
The right to health is a fundamental and universal right of all citizens and this will need to be respected and realized within a time frame. The Right to Health needs also to be located in the underlying determinants of health such as access to safe water and sanitation, adequate food and nutrition, housing, and secure livelihoods. Above all social inequities -- based on disparities along gender, caste, class and other lines – have a profound impact on the health of the poorest and the most marginalized.
The following concrete proposals are designed to reverse the present -- entirely unacceptable -- situation in the health sector, and to secure conditions of living and health care services that promote health in all its dimensions..
1.      Act on the Social Determinants of Health: In Haryana this aspect is not taken seriously .This would include promotion of food security by universalization and expansion of the Public Distribution System (to also provide local cereals, pulses and oil)in an effective way; a national policy on Child Health and nutrition and universalization of ICDS with expansion of staff and services to effectively cover under-3 children; ensure universal availability of safe water in each village and habitation of Haryana ; and universal access to safe hygienic toilets in all habitations.

2.      Address the Gender dimensions of Health: In Haryana gender bias is very predominant. This is reflected in sex ratio .Guarantee comprehensive, accessible, quality health services for all women and transgender persons for all their health needs which includes but is not limited to maternal care. Abolish all coercive laws, policies and practices that violate the reproductive, sexual and democratic rights of women; and regulate use of invasive reproductive technologies. Recognize gender based violence as a public health issue and ensure access to comprehensive health care (physical as well as psychosocial), screening, documentation, referrals, as well as coordinated, ethical medico-legal processes for survivors. Guarantee comprehensive, quality, accessible, adolescent-friendly health care, including for their reproductive and sexual health needs. Health Education in schools should be undertaken with pro gender orientation.

3.      Immediately reverse Caste Based Discrimination: Haryana is having caste domination in our social life.  Take immediate and effective steps to entirely reverse all forms of caste based discrimination, which is one of the most important social determinants of ill health. Immediate ban on manual scavenging. In the health care sector, special measures to promote priority access to discriminated sections of society.

4.      Enact a Right to Health Act in Haryana which assures universal access to good quality and comprehensive health care for all the entire range of primary, secondary and tertiary services, and that makes denial or non-availability for reasons of access, affordability or quality a justiciable offence.

5.      Increase Public Expenditure on Health to 3.6% of GDP annually (Rs 3000/- per capita at current rates) with the central government’s contribution being at least 1% of GDP (Rs 1000/- per capita). All public health expenditure to be tax financed. Public health spending to be increased to 5% of GDP in medium term.

6.      Ensure quality and assured availability of health care: A lot can be said about the present infrastructure and staff in Haryana Health Sector. It should be updated as per laid down norms. Quality of care to be ensured in all health facilities, which would mean health care that is effective, safe and non-exploitative, provided with due dignity and respect to patient rights, and which aims at patients’ comfort and satisfaction. Quality norms and standards shall not mean conforming to infrastructure or other standards, which favor large corporate hospitals, or worse medical tourism, and make it impossible to provide low cost, rational and effective care. Every public health care facility would be required to provide guaranteed health services appropriate to their level in assured manner. Public health facilities to be entirely free of user fees and the entire range of services to be provided directly by government run facilities and not through Public Private Partnerships (PPPs).

7.      Stop both Active and Passive Privatization of health care services in Haryana:  Necessary measures to stop active privatization in the form of transfer of public resources or assets to private entities that provide services on a commercial basis.  Measures to stop passive privatization by increasing investment in public health facilities, increasing number of beds and facilities in the public sector, and by expanding range of services available in public facilities. Public facilities to provide comprehensive health care services, not limited only to reproductive health care, immunization and a care for a few diseases of national importance.

8.      Training of Health workforce in Haryana on war footing : Increase public investment in education and training of the entire range of health personnel. Ensure that government run colleges to train a range of health workers, nurses and doctors are located in areas where they are needed most. Training to be reoriented to impart skills that address the health needs of local communities. The trend of commercialization of higher education in medical and allied health sciences to be reversed, along with stringent mechanisms for regulation of existing private institutions in a transparent manner. The functioning of the Medical Council of India and the Nursing Council of India to be thoroughly scrutinized and revamped to weed out rampant corrupt and unethical practices in these institutions.

9.      Well Governed, Adequate Public Health Work force in Haryana :Create adequate posts for the entire range of health personnel in the public health system. Regularize contractual employees and provide ASHAs, ANMs and all levels of public health system staff with adequate skills, salaries, and decent working conditions .The health and safety of workers, particularly of women to be assured. Act on available evidence from many states which show that the problem of the lack of doctors in rural areas is more a result of administrative incompetence and political failure than a matter of professional culture. Creation of a cadre of doctors, nurses and other paramedical workers who have training in primary health care, public health and in working as a team.

10.   Secure access to quality assured essential medicines and diagnostic services in all public health facilities, free of charge in Haryana . This would be achieved by developing autonomous and transparent procurement and demand driven distribution mechanism (on the lines of Tamil Nadu, Kerala and Rajasthan). For chronic illness it would mean ensuring such access throughout the year from a distribution point most accessible to patients. Generic prescriptions to be made compulsory in all health facilities. The various schemes for benefit of patients should be implemented earnestly. Monitoring system should be there from top to bottom.

11.   Participatory Planning, Community Participation and Community Based Monitoring of health services in Haryana to ensure accountability and responsiveness of services. Community Based Monitoring and Planning will be generalized and made a core component of all public health programs and health care services, to help effective delivery of services and ensure accountability and transparency.

12.   Eliminate Corruption in the Public Health System. Deep rooted problem in Haryana . Can be contained  through transparent policies for appointments, promotions, transfers, procurement of goods and services and infrastructure development – all of which are legislated through a Transparency Act (as in Tamil Nadu for procurement and Karnataka for transfers). Institution of robust grievance redressal systems, which are adequately financed and managed with some degree of autonomy from the management.

13.    Reverse Exploitation by private hospitals and protect ethical private non commercial private providers in Haryana : The national Clinical Establishment Act would have provisions for: observance of patient's rights in all clinical establishments; regulation of the rates of various services; elimination of kickbacks for prescriptions, diagnostics and referrals;and establishment of government supervised independent grievance redressal mechanisms for patients. Standards would be designed in a manner that would prevent corporatization of health care. This would promote genuine not-for-profit and ethical health care providers and would contain costs of care in the private sector.

14.   Absorb, over a period, existing publicly funded health insurance schemes (RSBY and different state health insurance schemes) into an expanded public health system publicly financed through general taxation .All entitlements available under these schemes would be made available through the public health system, suitably expanded and adequately resourced. This should include a comprehensive system for health care protection of unorganized and organized sector workers (providing primary, secondary and tertiary health care), linked with expansion and rejuvenation of the ESI.

15.   Eliminate the role of multi-lateral and bilateral financing agencies from all areas of technical assistance or health policy formulation. Eliminate the influence of agencies -- such as the World Bank, USAID and Gates Foundation, as well as consultancy organizations such as Deloitte and McKinsey – in formulation of national priorities and approaches to health care provisioning and financing. Build international collaboration for generation and sharing of knowledge resources, especially with other developing countries. Exert pressure at the governmental level to free WHO, UNICEF and other UN agencies from dependence on corporate financing and influence. Critically examine the offer of advise and expertise from such agencies till such time as they continue to be influenced by corporations and private foundations.

16.   Build National and State level capacity for Health research and development: The government would invest at least 5% of its public health budget on health research including health systems research. The government, for the purpose of promoting health systems research and research for domestic priorities, would develop institutions and strengthen existing institutions that are financed through public funds.

17.   Ensure access to essential and safe Drugs & Devices :Cost-based price-control of all medicines, measures to ensure drug and device safety ,banning of irrational medicines and irrational combinations, opening of generic medicine outlets in adequate numbers, mandatory provision for doctors to write generic names of medicines ,use of the public health safeguards in the Indian Patent Act to promote access to medicines, and active promotion of indigenous manufacture of most drugs and devices.

18.   Regulation of clinical trials and ethics in biomedical research: Develop a clear framework for the ethical conduct of clinical trials in India, combined with the regulation of all those that are involved -- sponsors of trials, CROs, ethics committees etc. Ensured that the CDSCO and the ICMR monitor the conduct of clinical trials at the trial sites and only permit trials at sites which are equipped to handle emergencies and adverse events. Fair compensation norms for trial participants who suffer from adverse events to be expeditiously developed and implemented. A charter of rights of clinical trial participantsto be developed and made justiciable.

19.   Ensure access to treatment and care of persons with mental illness (PWMI) through integration of the revised District Mental Health Program with the National Health Mission. The rights of PWMI need to be protected by adoption of the Mental Health Act and action on the draft mental health policy.

20.   Ensure facilities for estimation of residual effect of pesticides in human beings. Stop irrational and unethical use of Oxytocin in buffaloes and cows,

21.   Stop Nuclear Plant in Gorakhpur . It will have many health hazards. Be more vpertinent about environmental issues related in development of Industry.


शनिवार, 20 सितंबर 2014

चुनाव का माहौल

बहनों  व भाईयो,
चुनाव का माहौल
15 अक्तुबर को हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। अपने-अपने क्षेत्रों से हमारे प्रांत के मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे जो विधायक बन कर विधानसभा में जाएगें। संसदीय प्रणाली में वोट के अधिकार का प्रयोग करके आम जनता यह उम्मीद करती है कि उनके वोट से जीतने वाले प्रतिनिधि उनकी समस्याओं का समाधान करके उनके जीवन को बेहतर बनाएंगे। परन्तु हर चुनाव के बाद जनता की आशाएं धूल में मिल जाती हैं। सँविधान में दिए गए मौलिक अधिकार भी जनता तक नहीं पहुँच पाये हैं । आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? कड़वी सच्चाई यह है कि आम आदमी के जीवन की समस्याएं इसलिए हल नहीं हो रही क्योंकि आम आदमी के हक में नीतियां नहीं बन रही हैं। विधानसभा और लोकसभा में नीतियां बनाने वालों की राजनीति आम आदमी की राजनीति नहीं है। जरा ध्यान दें कि आज चुनाव से ठीक पहले हरियाणा में क्या नजारा है। कई पार्टियां और कई आजाद उम्मीदवार अज्ञात तरीकों से बटोरी गई धन दौलत के बल पर मंदिर, धर्मशाला, गऊशाला, चौपाल और चबूतरों के लिए चंदा बांट रहे हैं। कोई कन्यादान देकर गरीबों पर मेहरबानी कर रहा है। कोई राशन और कंबल बांट रहा है। कोई लैपटॉप और स्कूटर देने का वायदा कर रहा है। कोई मुफ्त पढ़ाई देने का प्रचार कर रहा है। कोई जात-गोत और धर्म की दुहाई दे रहा है। हम भी उनसे यह सवाल नहीं करते कि जिस पैसे की ये बाँट की जा रही है उसका इनकम टैक्स दिया है या नहीं ??ये सभी पार्टियां और नेता बार-बार सत्ता में रह चुके हैं।
कांग्रेस-भाजपा की समान आर्थिक नीतियां : यू.पी.ए. सरकार की विनाशकारी नीतियों से पैदा हुई बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से दुखी लोगों ने तीन महीने पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को हराया था। अच्छे दिनों के सपने दिखाकर भाजपा ने बड़े-बड़े पूंजीपति घरानों द्वारा चलाए जा रहे टी.वी.चैनलों में अंधाधुंध प्रचार करके जनता के वोटों की थोक में ठगी कर ली और हरियाणा की दस में से सात सीटें अपनी झोली में डाल ली। आज उसी भाजपा और मोदी सरकार का असली चेहरा केवल तीन महीने में ही बेनकाब हो गया। असलीयत सामने आ गई है कि अच्छे दिन आम आदमी के नहीं बल्कि बड़े-बड़े पूंजिपतियों और विदेशी पूंजी के ही आने थे। अच्छे दिनों की बात करने वाली भाजपा आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने की बात नहीं कर रही।
वामपंथी पार्टियों और किसान-मजदूर-कर्मचारियों के आंदोलनों के निरंतर दबाव में मनमोहन सिंह की यू.पी.ए. सरकार चाहते हुए भी जिन जनविरोधी कामों को अंजाम नहीं दे सकी थी नरेन्द्र मोदी की सरकार आज उन्हीं नीतियों को और भी ज्यादा नंगे रूप में थोंपने के रास्ते पर चल पड़ी है। बीमा क्षेत्र, रक्षा क्षेत्र, रेलवे और ऐसे तमाम विभागों में मोदी सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोल कर कार्पोरेट सैक्टर के प्रति अपनी वफादारी प्रकट कर दी है।  इस सरकार ने रेल किरायों और माल भाड़ों में वृद्धि करके मंहगाई को और अधिक बढ़ाया है। लंबे संघर्षों के पश्चात नया भूमि अधिग्रहण कानून बन पाया था। इसमें कम से कम 80 प्रतिशत किसानों की सहमति से भूमि अधिग्रहण के लिए जरूरी शर्त के रूप में रखी गई है। मोदी सरकार कार्पोरेट के  दबाव में इसे घटाकर 50 प्रतिशत करने की फिराक में है।
                     ट्रेड यूनियन और श्रम अधिकारों में मालिकपरस्त संशोधन करने की खतरनाक शुरूआत कर दी है। लंबे संघर्षों से नरेगा, खाद्य सुरक्षा अधिकार, शिक्षा अधिकार जैसे जो कानून बनवाए थे आज उन पर भी खतरा मंडरा रहा है। सब्सीडी खत्म करने के नाम पर अनाज, खाद, बीज, डीजल, गैस आदि पर सरकारी खर्चा घटाया जा रहा है। इससे जनता पर और भी ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ेगा लेकिन बड़े पूंजिपतियों और विदेशी कम्पनियों को पहले मनमोहन सरकार और अब मोदी सरकार लाखों करोड़ रूपये की रियायतों के तोहफे दे रही है। मतलब साफ है नवउदारीकरण की इन नीतियों को शासक वर्गों की कोई भी पार्टी बदलना ही नहीं चाहती। इन नीतियों से होने वाले विकास का चरित्र ही ऐसा है कि कार्पोरेट सैक्टर को जो मोटे मुनाफे दिये जाते हैं उनकी कीमत देश के कमेरे वर्गों से वसूली जाती है। इन्हीं नीतियों की बदौलत देश के बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन जैसे तेल, गैस, कोयला, जल, जंगल, जमीन और खनिज पदार्थों को बेरहमी से लूटवाए जाने का राष्ट्रविरोधी काम स्वयं सत्ताधारी पार्टियां कर रही हैं। कोयला,स्पैक्ट्रम, के.जी.बेसिन गैस जैसे बड़े घोटालों में कांगे्रस और भाजपा दोनों के ही मुख्यमंत्री व मंत्री संलिप्त पाए गए हैं। 
जनसाधारण के जीवन के लिए अब तक निर्मित किए गए सरकारी विभागों का निजीकरण किया जाना भी उदारीकरण की नीतियों का दूसरा विनाशकारी पहलू है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़ निर्माण इत्यादि क्षेत्रों में हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर निजीकरण करके आम नागरिकों को इन जनसेवाओं से वंचित किया गया है जो कि उनके बुनियादी अधिकारों में आती हैं। स्थायी की जगह अस्थायी नौकरियां, ठेकेदारी प्रथा, काम के घंटे बढ़ाये जाना, श्रम अधिकारों पर अंकुश आदि का प्रचलन इन्हीं नीतियों का अनिवार्य हिस्सा है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनावों के समय यह स्पष्ट किया था कि भाजपा की नीतियां कांगे्रस पार्टी से अलग नहीं हैं। इसलिए नवउदारीकरण की विनाशकारी नीतियों का विकल्प जरूरी है। हमने नेता और नीति दोनों को बदलने का आह्वान किया था। यह स्पष्ट है कि जनता के पक्ष में नीतियों को बदले  बिना बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, कृषि संकट जैसी बुनियादी समस्याएं हल नहीं हो सकती। 
नीतियों के कुप्रभाव और जनता की दुर्दशा  : केन्द्र और राज्यों में पिछले 25 सालों से जिस अंधाधुंध ढंग़ से ये नीतियां थोंपी गई हैं उनसे कृषि क्षेत्र समेत सभी क्षेत्रों में  संकट और अधिक गहरा हुआ है। आर्थिक गैर-बराबरी की खाई और ज्यादा चौड़ी हो गई है। जनता के जीवन स्तर में गिरावट आई है। पर्यावरण और जलवायु तक विकास के जनविरोधी व विकृत मॉडल की भेंट चढ़ रहे हैं। इन्हीं नीतियों के ही परिणामस्वरूप हरियाणा में भी स्थिति बेहद खराब हुई है। एक तरफ तो विकास के लंबे चौड़े दावे किये जा रहे हैं दूसरी ओर रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य, आवास, भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित आम आदमी की दशा बद से बदतर होती जा रही है। जिंदगी के लिये सभी जरूरी चीजों की कमरतोड़ महंगाई से उसका जीना दूभर हो गया है।  आधे से ज्यादा बच्चे व महिलाएं खून की कमी और कुपोषण का शिकार हैं। गरीबों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हो रहा हैं। लाखों मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए मजबूर हैं। नौकरियों में ठेकेदारी, आऊटसोर्सिंग, वर्कचार्ज इत्यादि अब एक स्थायी चलन हो गया है। बिजली निगम, नगरपालिका आदि विभागों में तैनात कच्चे कर्मचारियों  के रूप में कार्यरत नौजवान हादसों में बेमौत मारे जा रहे हंै। नौकरियों में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद बदस्तूर जारी है। यूनियन बनाने पर मारूती श्रमिकों पर जारी निर्मम दमन, भूमि अधिग्रहण के घोटाले और ईमानदार अफसरों का उत्पीडऩ हरियाणा  सरकार के ऐसे क्रियाकलाप हैं जो किसी से छिपे नहीं हैं। 
प्रदेश में अफसरशाही और ज्यादा निरंकुश हुई है। विश्वविद्यालयों की स्वायतता खत्म कर दी गई है। बरसों से छात्र संघों के चुनावों पर प्रतिबंध है। वास्तव में सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर की गई हैं। विकास से वंचित रखे गए तबकों का सामाजिक उत्पीडऩ भी बढ़ा है। भूमिहीन गरीब, दलित व पिछड़े तबके रोजी-रोटी के अवसरों से वंचित होकर पिसते जा रहे हैं। महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों की असुरक्षा बढ़ी है। लड़कियों व महिलाओं के खिलाफ दुष्कर्म और हिंसा की घटनाएं रूकने का नाम नहीं ले रही। इन तबकों में और युवाओं में अपनी अस्मिता और समानता की भावना भी जगी है। उसे दबाने के लिए जातिवादी, साम्प्रदायिक और पितृसत्ता जैसी स्वयंभू पंचायतों और अन्य निरंकुश प्रतिक्रियावादी शक्तियों को शासक पार्टियों के संरक्षण में उभारा जा रहा है। लिंग अनुपात की स्थिति हरियाणा में बहुत खराब है।

अपराधीकरण दिन प्रतिदिन भयंकर रूप लेता जा रहा है। हरियाणा के एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों व विधायकों पर गंभीर आपराधिक आरोपों में मुकदमें दर्ज हैं। सामाजिक विघटन, नैतिक मूल्यों का पतन और नवउदारवाद की अंध उपभोक्तावादी अपसंस्कृति दीमक की तरह से हमारे समाज को चाट रही है। प्रदेश के बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, उच्चकोटी के शोधकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों की घोर अवहेलना की जा रही है। समाज के सर्वांगिण विकास में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। उपरोक्त स्थिति के लिए 10 वर्षों से सत्तासीन कांग्रेस पार्टी बच नहीं सकती। असल में यह विकास नहीं बल्कि विशुद्ध नवउदारीकरण का ऐसा विकृत नमूना है जिसमें जनता के हितों की कीमत पर कार्पोरेट सैक्टर और ठेकेदारी का कब्जा हुआ है।
भाजपा की असलियत: भाजपा किसी भी दृष्टि से कांग्रेस से बेहतर नहीं है। भाजपा पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ  (आर.एस.एस.)का नियंत्रण है। आर.एस.एस. एक घोर साम्प्रदायिक और निरंकुश संगठन है। धर्म के नाम पर फूट डालने की इनकी विभाजनकारी गतिविधियां हमारे देश की विविधता, आपसी सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। हिंदुत्व की कट्टरता उसी तरह खतरनाक है जैसे इस्लाम या किसी अन्य धर्म के नाम पर कट्टरता।
भाजपा-आर.एस.एस. लोकतंत्र विरोधी व समानता विरोधी ताकतें हैं। ये वर्ण व्यवस्था, पितृसत्ता और जातिवाद की जकड़ बनाये रख कर कमजोर तबकों को उनके अधिकारों से वंचित रखना चाहती हैं। दूसरी
पार्र्टियों के स्वार्थी नेताओं के  थोक मेंदल बदल करवाने की घटिया राजनीतिक तिकड़मों पर भाजपा उतर आई है। वह तमाम तरह के झूठ और छल कपट से लोगों में फूटपरस्ती के नारों से धार्मिक भावनाएं भडक़ाने के अपने चिर परिचित क्रियाकलापों से लोगों के वोट ठगना चाहती है। कहीं ‘लव जेहाद’ और कहीं गाय की दुहाई देकर वह वोट बटोरना चाहती है। हरियाणा में भी हाल में ही मेवात के तावड़ू कस्बे में भाजपा समर्थित संगठनों ने योजनाबद्ध ढंग़ से  साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ाने की निंदनीय घटनाएं की हैं। इन इलाकों में हमेशा से मेव मुस्लिम और हिंदु समुदाय के सभी लोग आपसी सदभाव से रहते आए हैं। कई राजनैतिक दल भाजपा व आर.एस.एस. के इस दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी एजेंडा की उपेक्षा करके उनसे सांठ-गांठ करना चाहते हैं। वे सत्ता के लालच में जनता से विश्वासघात करने के दोषी हैं। इनैलो समेत कई अन्य पार्टियां चाहती है  कि चुनाव के बाद भाजपा के साथ  सौदेबाजी कर ले। कांग्रेस पार्टी में भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडा का विरोध करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है और कांग्रेस पार्टी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने में सक्षम नहीं है। 
राजनीति पर निहित स्वार्थों की घेराबंदी: विधानसभा चुनावों से पहले मौकापरस्ती, दल-बदल, सिद्धांतहीनता, छल-कपट, जात-पात,साम्प्रदायिकता और काले धन का जो नंगा नाच राजनीति में हो रहा है उसे समझना पड़ेगा। चुनावों में मतदाताओं को रिझाने के लिए पैसा बांटना, शराब पिलाना, झूठे लारे देना, बड़े-बड़े विज्ञापनों से भ्रमित करने जैसे औछे हथकंडे बड़े पैमाने पर अपनाए जा रहे हैं।
हरियाणा में अब तक हावी रही राजनीति जनता को टुकड़ों का मोहताज बनाए रखना चाहती है। नीति बदलने की बजाय टुकड़े फैंके जा रहे हैं। अधिकार की बजाय यह राजनीति खैरात देना चाहती है। ये राजनेता नहीं चाहते कि जनता सिर ऊंचा करके अपने अधिकारों का दावा करे। काले धन का दबदबा और फूटपरस्ती के हथकंडे आज पूरी राजनीति और लोकतंत्र पर जिस प्रकार का शिकंजा कसना चाहते हैं उसे विफल करना इस चुनाव में आम जनता और मतदाताओं के लिए एक चुनौती बन गया है। ऐसी राजनीति को हराने के लिए जरूरी है कि रोजी-रोटी और मान सम्मान के लिए संघर्ष करने वाली माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को जिताकर विधानसभा में भेजा जाए।
माकपा के संघर्ष:  माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा धर्म निरपेक्षता, आपसी सद्भाव तथा राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए कार्य किया है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, कर्मचारियों, स्कीम वर्करों, छात्रों, युवाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों आदि के आर्थिक व सामाजिक हितों की लड़ाईयां लड़ी हैं। हमारी पार्टी ने अन्य प्रगतिशील ताकतों केे  साथ मिलकर समाज सुधार के कार्यक्रम चलाए हैं। दलित उत्पीडऩ, नशाखोरी, महिलाओं के विरूद्ध हिंसा और गुंडागर्दी के खिलाफ जनता को सडक़ों पर लामबंद किया है।
हमने जनसंघर्षों के द्वारा कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। फसल बर्बादी का मुआवजा, रिहायशी प्लॉट, नरेगा, राशन वितरण, न्यूनतम आयोग की सिफारिशें लागू हों। सामान्य जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर हिस्सों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान हो। परन्तु पहले से जिन हिस्सों को आरक्षण की सुविधा मिल रही है उसमें कोई कटौती नहीं हो। कानून बनाकर 50 फीसदी के अधिकतम आरक्षण की सीमा को खत्म कर सामान्य जाति के गरीबों को आरक्षण दिया जाए। अनुसूचित जाति उपयोजना को लागू करवाना।
सामाजिक क्षेत्र : लिंग अनुपात में सुधार की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाएं। अश्लील संस्कृति पर अंकुश लगे। विकलांगों के साथ होने वाले सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक तमाम क्षेत्रों में भेदभाव समाप्त हो और उनको विकास के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं तथा राज्य में विकलांग आयोग का गठन किया जाए। विकलांगों, विधवाओं और बुजुर्गों की बुढ़ापा पेंशन बढ़ाई जाए जो न्यूनतम वेतन का आधा हो अथवा कम से कम 4000 रूपये हो। खेलों व अन्य क्षेत्रों में विशिष्टता प्राप्त व्यक्तियों के लिए पैंशन का प्रावधान किया जाए।
स्वयंभू जातिवादी पंचायतों की गैरकानूनी गतिविधियों पर रोक लगे और ऐसी पंचायतों को राज्य द्वारा सरंक्षण दिया जाना बंद हो। राज्य में महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, मानवाधिकार आयोग, विकलांग अधिकार आयोग इत्यादि का चयन निष्पक्ष प्रणाली से हो। ये सरकारी प्रभाव से मुक्त हों, स्वतंत्र और प्रभावी ढंग़ से काम कर सकें इसके लिए कानूनी प्रावधान किए जाएं।
नशाखोरी :  प्रदेश में शराब व नशाखोरी का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते जहां एक तरफ महिलाओं का जीना दुभर हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा असामाजिक व आपराधिक गतिविधियों के जाल में फंस रहा है। इस सामाजिक बुराई पर अंकुश लगाने के लिए व्यापक समाज सुधार का कार्यक्रम चलाना व ज्यादा राजस्व हासिल करने के उद्देश्य से बनाई गई आबकारी नीति को बदलना है।
खेल व संस्कृति: स्थानीय स्तर पर विशेषकर महिलाओं के लिए खेल सुविधाओं का विस्तार व ग्रामीण खेल मेलों का आयोजन। विश्वविद्यालयों समेत सभी सार्वजनिक स्थानों पर फूहड़ व असभ्य सांस्कृतिक आयोजन बंद हो और समानता पर आधारित स्वस्थ मानवीय सांस्कृतिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार। 
शासन-प्रशासन: पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाना एवम विकास योजनाओं को लागू करने में स्थानीय लोगों की भागेदारी सुनिश्चित कर जनतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना। पंचायतों, नगर परिषदों व नगर निगमों में महिला प्रतिनिधियों की भागेदारी बढ़ाना। प्रशासन को जनता के प्रति जबावदेह बनाना। चुनावों में बुनियादी सुधार करना। कर्मचारियों का स्थानांतरण मनमाने ढ़ंग से मुख्यमंत्री/मंत्री का विशेषाधिकार न हो कर सर्वस्वीकार्य न्यायसंगत स्थानांतरण नीति बनाई जाए और उसे कड़ाई से लागू किया जाए।
परमाणु संयत्र बारे: जाने-माने परमाणु विशेषज्ञों द्वारा प्रकट की गई सुरक्षा व पर्यावरण संबंधी गंभीर आशंकाओं का निराकरण किये बिना गोरखपुर परमाणु संयंत्र के निर्माण की दिशा में अगला कदम न उठाया जाए।
                          अपील
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की हरियाणा राज्य कमेटी प्रदेश की जनता के सामने यह संकल्प पेश करती है कि उपरोक्त मांगों व मुद्दों को हासिल करने हेतू वह निरंतर  संघर्षरत रहेगी। हमारी पार्टी के तमाम कार्यकर्ता और नेतृत्वकारी साथी राजनीति को जनसेवा का माध्यम मानकर पूरे समर्पण से काम करते रहेंगे।  उन्होंने कमेरे वर्गों और वंचित तबकों की हिमायत में अपनी जिंदगियां लगाई हैं। वे दहेज प्रथा, अंधविश्वास, रूढि़वाद, छुआछूत, जातीय व लिंगभेद से समाज को मुक्त करवाने के लिए इस शोषणकारी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था को बदलने के प्रति वचनबद्ध हैं। हमारे साथी कठिन से कठिन परिस्थितियों में सादगी, ईमानदारी, मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं। 
हमारी पार्टी ने जिन उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा किया है वे सभी साथी संघर्षशील और कर्मठ हैं जिन्होंने हमेशा किसान, मजदूरों, छात्र, युवाओं, महिलाओं, वेतन भोगी तबकों के संगठनों के मंचों से लड़ाइयों का नेतृत्व किया है।
अनुभव ने दिखाया है कि मेहनतकश जनता की राजनीति करने वाले प्रतिनिधि ही विधानसभा में जाकर उनके हक में आवाज उठा सकते हैं। शासक वर्गों की पार्टियों के दलबदलू और स्वार्थ की राजनीति करने वाले लोगों ने राजनीति को व्यापार जैसा धंधा बना डाला है। वे इसमें काला धन निवेश करते हैं और फिर जनता के हितों की बलि चढ़ाकर धन्ना सेठों और कम्पनियों के लिए काम करते देखे जाते हैं। छल-कपट, फ रेब, लूट, झूठ और फूट की राजनीति करने वाले वर्गों ने चुनाव की राजनीति को अपने कब्जे में ले रखा है। वे आम जनता के हकों पर कुंडली मारे बैठे हैं। जनता को अपने हक हासिल करने के लिए राजनीति के क्षेत्र को आजाद करवाना होगा। आपस में मिलकर साहस जुटाने से यह लड़ाई जीती जा सकती है और यह हमें जीतनी होगी। आओ संकल्प लें कि जात-पात और धर्म सम्प्रदाय के झूठे नारों में नहीं बटेंगे और माकपा उम्मीदवारों के चुनाव निशान दराती, हथौड़ा और सितारा के सामने वाला बटन दबाकर अपनी रोजी-रोटी और सामाजिक न्याय की आवाज की गूंज विधानसभा तक पहुंचाएंगे।
हम प्रदेश की जनता से अपील करते हैं कि सी पी आई (एम) एवं वामपंथी पार्टियों को अपना वोट देकर कामयाब बनाएं।



कांग्रेस को हटाओ, भाजपा को हराओ।
मौकापरस्तों-फूटपरस्तों को नकारो
माकपा-वामपंथ को विधानसभा भेजो


मेहनतकशों के असली हिमायती वामपंथी उम्मीदवारों को विधानसभा में भेजो
मौकापरस्त, फूटपरस्त और लुटेरी राजनीति
का शिकंजा तोड़ो


राजनीति की तस्वीर बदलो।
कमेरे की तकदीर बदलो।।

राजनीति के मायने बदलो।
नेता-नीति दोनों बदलो।।

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

न्यूनतम वेतन

 भारत सरकार के श्रम मंत्रालय की 2002 की रिपोर्ट के अनुसार रोजगार में लगे हुए एक व्यक्ति द्वारा देश की कुल घरेलू पैदावार में प्रति घंटा औसतन 250 . 20 रूपये या 2000 रूपये प्रतिदिन अथवा 60 हजार रूपये प्रति माह का योगदान किया जा रहा है । अगर हम अलग अलग राज्यों के न्यूनतम वेतन पर नजर डालें तो मजदूरों को इसका दसवां हिस्सा ही 8 घण्टे रोजाना के वेतन के रूप में मिलता है । 

SOME SLOGANS

कांग्रेस जाये भाजपा  आये 
महंगाई क्यों बढ़ती जाये 
                                    मोदी सरकार के देखो खेल              
                                     महंगी रेल और महंगा तेल 
 जात -धर्म पर जो लड़वाये 
देश द्रोही वो कहलाये 
                                         गऊ -धर्म का नाम है 
                                         दंगे इनका काम है 
पूंजीपतियों के हैं संघी साथी 
करें लफ्फाजी झूठी -साची 
                                           विकास की ये ढोल बजाते 
                                           खेती धंधे सब पिटते जाते 
रोटी कपडा और मकान 
सबको चाहिए एक समान