मजदूरों और कर्मचारियों से एक बात चीत
पिछले 30 सालों में जबसे नयी उदार वादी नीतियां लागू गई हैं भारत में , देश में मेहनत कश और पूंजीपतियों के मुनाफे तेजी से बढे हैं । क्यों ? क्या कभी सोचा है ?? क्या कारण हैं इस सबके ??? सोचना बहुत जरूरी हो गया है कि नहीं ????
उदाहरण के लिए सरकारी रिपोर्ट अनुसार 1980 में किसी भी निर्मित वस्तु की कीमत में जहाँ मजदूरों के वेतन का हिस्सा औसतन 30 प्रतिशत था और पूंजीपतियों का मुनाफा औसतन बीस प्रतिशत से भी कम था , वहीँ वर्ष 2010 में मजदूर के वेतन का हिस्सा घटकर 9 . 5 प्रतिशत रह गया और पूंजी पति का मुनाफा बढ़ कर 60 प्रतिशत हो गया । आखिर ऐसा क्यूँ हुआ ???
ज़वाब एक उनका है मगर हमने अपना जवाब नहीं ढूँढा और किस्मत का खेल कहकर बैठ गए । क्या असल में ऐसा है ? नहीं ! बिलकुल नहीं । किस्मत का खेल नहीं नीति का खेल है । यह खेल हमें समझना ही होगा ।
पिछले 30 सालों में जबसे नयी उदार वादी नीतियां लागू गई हैं भारत में , देश में मेहनत कश और पूंजीपतियों के मुनाफे तेजी से बढे हैं । क्यों ? क्या कभी सोचा है ?? क्या कारण हैं इस सबके ??? सोचना बहुत जरूरी हो गया है कि नहीं ????
उदाहरण के लिए सरकारी रिपोर्ट अनुसार 1980 में किसी भी निर्मित वस्तु की कीमत में जहाँ मजदूरों के वेतन का हिस्सा औसतन 30 प्रतिशत था और पूंजीपतियों का मुनाफा औसतन बीस प्रतिशत से भी कम था , वहीँ वर्ष 2010 में मजदूर के वेतन का हिस्सा घटकर 9 . 5 प्रतिशत रह गया और पूंजी पति का मुनाफा बढ़ कर 60 प्रतिशत हो गया । आखिर ऐसा क्यूँ हुआ ???
ज़वाब एक उनका है मगर हमने अपना जवाब नहीं ढूँढा और किस्मत का खेल कहकर बैठ गए । क्या असल में ऐसा है ? नहीं ! बिलकुल नहीं । किस्मत का खेल नहीं नीति का खेल है । यह खेल हमें समझना ही होगा ।
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