बहनों व भाईयो,
चुनाव का माहौल
15 अक्तुबर को हरियाणा विधानसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। अपने-अपने क्षेत्रों से हमारे प्रांत के मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे जो विधायक बन कर विधानसभा में जाएगें। संसदीय प्रणाली में वोट के अधिकार का प्रयोग करके आम जनता यह उम्मीद करती है कि उनके वोट से जीतने वाले प्रतिनिधि उनकी समस्याओं का समाधान करके उनके जीवन को बेहतर बनाएंगे। परन्तु हर चुनाव के बाद जनता की आशाएं धूल में मिल जाती हैं। सँविधान में दिए गए मौलिक अधिकार भी जनता तक नहीं पहुँच पाये हैं । आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? कड़वी सच्चाई यह है कि आम आदमी के जीवन की समस्याएं इसलिए हल नहीं हो रही क्योंकि आम आदमी के हक में नीतियां नहीं बन रही हैं। विधानसभा और लोकसभा में नीतियां बनाने वालों की राजनीति आम आदमी की राजनीति नहीं है। जरा ध्यान दें कि आज चुनाव से ठीक पहले हरियाणा में क्या नजारा है। कई पार्टियां और कई आजाद उम्मीदवार अज्ञात तरीकों से बटोरी गई धन दौलत के बल पर मंदिर, धर्मशाला, गऊशाला, चौपाल और चबूतरों के लिए चंदा बांट रहे हैं। कोई कन्यादान देकर गरीबों पर मेहरबानी कर रहा है। कोई राशन और कंबल बांट रहा है। कोई लैपटॉप और स्कूटर देने का वायदा कर रहा है। कोई मुफ्त पढ़ाई देने का प्रचार कर रहा है। कोई जात-गोत और धर्म की दुहाई दे रहा है। हम भी उनसे यह सवाल नहीं करते कि जिस पैसे की ये बाँट की जा रही है उसका इनकम टैक्स दिया है या नहीं ??ये सभी पार्टियां और नेता बार-बार सत्ता में रह चुके हैं।
कांग्रेस-भाजपा की समान आर्थिक नीतियां : यू.पी.ए. सरकार की विनाशकारी नीतियों से पैदा हुई बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से दुखी लोगों ने तीन महीने पहले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को हराया था। अच्छे दिनों के सपने दिखाकर भाजपा ने बड़े-बड़े पूंजीपति घरानों द्वारा चलाए जा रहे टी.वी.चैनलों में अंधाधुंध प्रचार करके जनता के वोटों की थोक में ठगी कर ली और हरियाणा की दस में से सात सीटें अपनी झोली में डाल ली। आज उसी भाजपा और मोदी सरकार का असली चेहरा केवल तीन महीने में ही बेनकाब हो गया। असलीयत सामने आ गई है कि अच्छे दिन आम आदमी के नहीं बल्कि बड़े-बड़े पूंजिपतियों और विदेशी पूंजी के ही आने थे। अच्छे दिनों की बात करने वाली भाजपा आज महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी दूर करने की बात नहीं कर रही।
वामपंथी पार्टियों और किसान-मजदूर-कर्मचारियों के आंदोलनों के निरंतर दबाव में मनमोहन सिंह की यू.पी.ए. सरकार चाहते हुए भी जिन जनविरोधी कामों को अंजाम नहीं दे सकी थी नरेन्द्र मोदी की सरकार आज उन्हीं नीतियों को और भी ज्यादा नंगे रूप में थोंपने के रास्ते पर चल पड़ी है। बीमा क्षेत्र, रक्षा क्षेत्र, रेलवे और ऐसे तमाम विभागों में मोदी सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दरवाजे खोल कर कार्पोरेट सैक्टर के प्रति अपनी वफादारी प्रकट कर दी है। इस सरकार ने रेल किरायों और माल भाड़ों में वृद्धि करके मंहगाई को और अधिक बढ़ाया है। लंबे संघर्षों के पश्चात नया भूमि अधिग्रहण कानून बन पाया था। इसमें कम से कम 80 प्रतिशत किसानों की सहमति से भूमि अधिग्रहण के लिए जरूरी शर्त के रूप में रखी गई है। मोदी सरकार कार्पोरेट के दबाव में इसे घटाकर 50 प्रतिशत करने की फिराक में है।
ट्रेड यूनियन और श्रम अधिकारों में मालिकपरस्त संशोधन करने की खतरनाक शुरूआत कर दी है। लंबे संघर्षों से नरेगा, खाद्य सुरक्षा अधिकार, शिक्षा अधिकार जैसे जो कानून बनवाए थे आज उन पर भी खतरा मंडरा रहा है। सब्सीडी खत्म करने के नाम पर अनाज, खाद, बीज, डीजल, गैस आदि पर सरकारी खर्चा घटाया जा रहा है। इससे जनता पर और भी ज्यादा आर्थिक बोझ पड़ेगा लेकिन बड़े पूंजिपतियों और विदेशी कम्पनियों को पहले मनमोहन सरकार और अब मोदी सरकार लाखों करोड़ रूपये की रियायतों के तोहफे दे रही है। मतलब साफ है नवउदारीकरण की इन नीतियों को शासक वर्गों की कोई भी पार्टी बदलना ही नहीं चाहती। इन नीतियों से होने वाले विकास का चरित्र ही ऐसा है कि कार्पोरेट सैक्टर को जो मोटे मुनाफे दिये जाते हैं उनकी कीमत देश के कमेरे वर्गों से वसूली जाती है। इन्हीं नीतियों की बदौलत देश के बेशकीमती प्राकृतिक संसाधन जैसे तेल, गैस, कोयला, जल, जंगल, जमीन और खनिज पदार्थों को बेरहमी से लूटवाए जाने का राष्ट्रविरोधी काम स्वयं सत्ताधारी पार्टियां कर रही हैं। कोयला,स्पैक्ट्रम, के.जी.बेसिन गैस जैसे बड़े घोटालों में कांगे्रस और भाजपा दोनों के ही मुख्यमंत्री व मंत्री संलिप्त पाए गए हैं।
जनसाधारण के जीवन के लिए अब तक निर्मित किए गए सरकारी विभागों का निजीकरण किया जाना भी उदारीकरण की नीतियों का दूसरा विनाशकारी पहलू है। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, सडक़ निर्माण इत्यादि क्षेत्रों में हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर निजीकरण करके आम नागरिकों को इन जनसेवाओं से वंचित किया गया है जो कि उनके बुनियादी अधिकारों में आती हैं। स्थायी की जगह अस्थायी नौकरियां, ठेकेदारी प्रथा, काम के घंटे बढ़ाये जाना, श्रम अधिकारों पर अंकुश आदि का प्रचलन इन्हीं नीतियों का अनिवार्य हिस्सा है। माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनावों के समय यह स्पष्ट किया था कि भाजपा की नीतियां कांगे्रस पार्टी से अलग नहीं हैं। इसलिए नवउदारीकरण की विनाशकारी नीतियों का विकल्प जरूरी है। हमने नेता और नीति दोनों को बदलने का आह्वान किया था। यह स्पष्ट है कि जनता के पक्ष में नीतियों को बदले बिना बेरोजगारी, गरीबी, भ्रष्टाचार, कृषि संकट जैसी बुनियादी समस्याएं हल नहीं हो सकती।
नीतियों के कुप्रभाव और जनता की दुर्दशा : केन्द्र और राज्यों में पिछले 25 सालों से जिस अंधाधुंध ढंग़ से ये नीतियां थोंपी गई हैं उनसे कृषि क्षेत्र समेत सभी क्षेत्रों में संकट और अधिक गहरा हुआ है। आर्थिक गैर-बराबरी की खाई और ज्यादा चौड़ी हो गई है। जनता के जीवन स्तर में गिरावट आई है। पर्यावरण और जलवायु तक विकास के जनविरोधी व विकृत मॉडल की भेंट चढ़ रहे हैं। इन्हीं नीतियों के ही परिणामस्वरूप हरियाणा में भी स्थिति बेहद खराब हुई है। एक तरफ तो विकास के लंबे चौड़े दावे किये जा रहे हैं दूसरी ओर रोजगार, शिक्षा-स्वास्थ्य, आवास, भोजन जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित आम आदमी की दशा बद से बदतर होती जा रही है। जिंदगी के लिये सभी जरूरी चीजों की कमरतोड़ महंगाई से उसका जीना दूभर हो गया है। आधे से ज्यादा बच्चे व महिलाएं खून की कमी और कुपोषण का शिकार हैं। गरीबों को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं हो रहा हैं। लाखों मजदूर असंगठित क्षेत्र में काम करने के लिए मजबूर हैं। नौकरियों में ठेकेदारी, आऊटसोर्सिंग, वर्कचार्ज इत्यादि अब एक स्थायी चलन हो गया है। बिजली निगम, नगरपालिका आदि विभागों में तैनात कच्चे कर्मचारियों के रूप में कार्यरत नौजवान हादसों में बेमौत मारे जा रहे हंै। नौकरियों में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी और भाई-भतीजावाद बदस्तूर जारी है। यूनियन बनाने पर मारूती श्रमिकों पर जारी निर्मम दमन, भूमि अधिग्रहण के घोटाले और ईमानदार अफसरों का उत्पीडऩ हरियाणा सरकार के ऐसे क्रियाकलाप हैं जो किसी से छिपे नहीं हैं।
प्रदेश में अफसरशाही और ज्यादा निरंकुश हुई है। विश्वविद्यालयों की स्वायतता खत्म कर दी गई है। बरसों से छात्र संघों के चुनावों पर प्रतिबंध है। वास्तव में सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर की गई हैं। विकास से वंचित रखे गए तबकों का सामाजिक उत्पीडऩ भी बढ़ा है। भूमिहीन गरीब, दलित व पिछड़े तबके रोजी-रोटी के अवसरों से वंचित होकर पिसते जा रहे हैं। महिलाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों की असुरक्षा बढ़ी है। लड़कियों व महिलाओं के खिलाफ दुष्कर्म और हिंसा की घटनाएं रूकने का नाम नहीं ले रही। इन तबकों में और युवाओं में अपनी अस्मिता और समानता की भावना भी जगी है। उसे दबाने के लिए जातिवादी, साम्प्रदायिक और पितृसत्ता जैसी स्वयंभू पंचायतों और अन्य निरंकुश प्रतिक्रियावादी शक्तियों को शासक पार्टियों के संरक्षण में उभारा जा रहा है। लिंग अनुपात की स्थिति हरियाणा में बहुत खराब है।
अपराधीकरण दिन प्रतिदिन भयंकर रूप लेता जा रहा है। हरियाणा के एक दर्जन से ज्यादा मंत्रियों व विधायकों पर गंभीर आपराधिक आरोपों में मुकदमें दर्ज हैं। सामाजिक विघटन, नैतिक मूल्यों का पतन और नवउदारवाद की अंध उपभोक्तावादी अपसंस्कृति दीमक की तरह से हमारे समाज को चाट रही है। प्रदेश के बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों, उच्चकोटी के शोधकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों की घोर अवहेलना की जा रही है। समाज के सर्वांगिण विकास में इनकी अहम भूमिका हो सकती है। उपरोक्त स्थिति के लिए 10 वर्षों से सत्तासीन कांग्रेस पार्टी बच नहीं सकती। असल में यह विकास नहीं बल्कि विशुद्ध नवउदारीकरण का ऐसा विकृत नमूना है जिसमें जनता के हितों की कीमत पर कार्पोरेट सैक्टर और ठेकेदारी का कब्जा हुआ है।
भाजपा की असलियत: भाजपा किसी भी दृष्टि से कांग्रेस से बेहतर नहीं है। भाजपा पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आर.एस.एस.)का नियंत्रण है। आर.एस.एस. एक घोर साम्प्रदायिक और निरंकुश संगठन है। धर्म के नाम पर फूट डालने की इनकी विभाजनकारी गतिविधियां हमारे देश की विविधता, आपसी सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। हिंदुत्व की कट्टरता उसी तरह खतरनाक है जैसे इस्लाम या किसी अन्य धर्म के नाम पर कट्टरता।
भाजपा-आर.एस.एस. लोकतंत्र विरोधी व समानता विरोधी ताकतें हैं। ये वर्ण व्यवस्था, पितृसत्ता और जातिवाद की जकड़ बनाये रख कर कमजोर तबकों को उनके अधिकारों से वंचित रखना चाहती हैं। दूसरी
पार्र्टियों के स्वार्थी नेताओं के थोक मेंदल बदल करवाने की घटिया राजनीतिक तिकड़मों पर भाजपा उतर आई है। वह तमाम तरह के झूठ और छल कपट से लोगों में फूटपरस्ती के नारों से धार्मिक भावनाएं भडक़ाने के अपने चिर परिचित क्रियाकलापों से लोगों के वोट ठगना चाहती है। कहीं ‘लव जेहाद’ और कहीं गाय की दुहाई देकर वह वोट बटोरना चाहती है। हरियाणा में भी हाल में ही मेवात के तावड़ू कस्बे में भाजपा समर्थित संगठनों ने योजनाबद्ध ढंग़ से साम्प्रदायिक हिंसा भडक़ाने की निंदनीय घटनाएं की हैं। इन इलाकों में हमेशा से मेव मुस्लिम और हिंदु समुदाय के सभी लोग आपसी सदभाव से रहते आए हैं। कई राजनैतिक दल भाजपा व आर.एस.एस. के इस दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादी एजेंडा की उपेक्षा करके उनसे सांठ-गांठ करना चाहते हैं। वे सत्ता के लालच में जनता से विश्वासघात करने के दोषी हैं। इनैलो समेत कई अन्य पार्टियां चाहती है कि चुनाव के बाद भाजपा के साथ सौदेबाजी कर ले। कांग्रेस पार्टी में भाजपा के साम्प्रदायिक एजेंडा का विरोध करने की इच्छाशक्ति ही नहीं है और कांग्रेस पार्टी धर्मनिरपेक्षता की रक्षा करने में सक्षम नहीं है।
राजनीति पर निहित स्वार्थों की घेराबंदी: विधानसभा चुनावों से पहले मौकापरस्ती, दल-बदल, सिद्धांतहीनता, छल-कपट, जात-पात,साम्प्रदायिकता और काले धन का जो नंगा नाच राजनीति में हो रहा है उसे समझना पड़ेगा। चुनावों में मतदाताओं को रिझाने के लिए पैसा बांटना, शराब पिलाना, झूठे लारे देना, बड़े-बड़े विज्ञापनों से भ्रमित करने जैसे औछे हथकंडे बड़े पैमाने पर अपनाए जा रहे हैं।
हरियाणा में अब तक हावी रही राजनीति जनता को टुकड़ों का मोहताज बनाए रखना चाहती है। नीति बदलने की बजाय टुकड़े फैंके जा रहे हैं। अधिकार की बजाय यह राजनीति खैरात देना चाहती है। ये राजनेता नहीं चाहते कि जनता सिर ऊंचा करके अपने अधिकारों का दावा करे। काले धन का दबदबा और फूटपरस्ती के हथकंडे आज पूरी राजनीति और लोकतंत्र पर जिस प्रकार का शिकंजा कसना चाहते हैं उसे विफल करना इस चुनाव में आम जनता और मतदाताओं के लिए एक चुनौती बन गया है। ऐसी राजनीति को हराने के लिए जरूरी है कि रोजी-रोटी और मान सम्मान के लिए संघर्ष करने वाली माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को जिताकर विधानसभा में भेजा जाए।
माकपा के संघर्ष: माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने हमेशा धर्म निरपेक्षता, आपसी सद्भाव तथा राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए कार्य किया है। किसानों, मजदूरों, महिलाओं, कर्मचारियों, स्कीम वर्करों, छात्रों, युवाओं, दलितों, अल्पसंख्यकों आदि के आर्थिक व सामाजिक हितों की लड़ाईयां लड़ी हैं। हमारी पार्टी ने अन्य प्रगतिशील ताकतों केे साथ मिलकर समाज सुधार के कार्यक्रम चलाए हैं। दलित उत्पीडऩ, नशाखोरी, महिलाओं के विरूद्ध हिंसा और गुंडागर्दी के खिलाफ जनता को सडक़ों पर लामबंद किया है।
हमने जनसंघर्षों के द्वारा कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। फसल बर्बादी का मुआवजा, रिहायशी प्लॉट, नरेगा, राशन वितरण, न्यूनतम आयोग की सिफारिशें लागू हों। सामान्य जातियों के आर्थिक रूप से कमजोर हिस्सों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान हो। परन्तु पहले से जिन हिस्सों को आरक्षण की सुविधा मिल रही है उसमें कोई कटौती नहीं हो। कानून बनाकर 50 फीसदी के अधिकतम आरक्षण की सीमा को खत्म कर सामान्य जाति के गरीबों को आरक्षण दिया जाए। अनुसूचित जाति उपयोजना को लागू करवाना।
सामाजिक क्षेत्र : लिंग अनुपात में सुधार की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जाएं। अश्लील संस्कृति पर अंकुश लगे। विकलांगों के साथ होने वाले सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक तमाम क्षेत्रों में भेदभाव समाप्त हो और उनको विकास के भरपूर अवसर प्रदान किए जाएं तथा राज्य में विकलांग आयोग का गठन किया जाए। विकलांगों, विधवाओं और बुजुर्गों की बुढ़ापा पेंशन बढ़ाई जाए जो न्यूनतम वेतन का आधा हो अथवा कम से कम 4000 रूपये हो। खेलों व अन्य क्षेत्रों में विशिष्टता प्राप्त व्यक्तियों के लिए पैंशन का प्रावधान किया जाए।
स्वयंभू जातिवादी पंचायतों की गैरकानूनी गतिविधियों पर रोक लगे और ऐसी पंचायतों को राज्य द्वारा सरंक्षण दिया जाना बंद हो। राज्य में महिला आयोग, अनुसूचित जाति आयोग, मानवाधिकार आयोग, विकलांग अधिकार आयोग इत्यादि का चयन निष्पक्ष प्रणाली से हो। ये सरकारी प्रभाव से मुक्त हों, स्वतंत्र और प्रभावी ढंग़ से काम कर सकें इसके लिए कानूनी प्रावधान किए जाएं।
नशाखोरी : प्रदेश में शराब व नशाखोरी का प्रचलन लगातार बढ़ रहा है। जिसके चलते जहां एक तरफ महिलाओं का जीना दुभर हो रहा है। वहीं दूसरी तरफ युवा पीढ़ी का बड़ा हिस्सा असामाजिक व आपराधिक गतिविधियों के जाल में फंस रहा है। इस सामाजिक बुराई पर अंकुश लगाने के लिए व्यापक समाज सुधार का कार्यक्रम चलाना व ज्यादा राजस्व हासिल करने के उद्देश्य से बनाई गई आबकारी नीति को बदलना है।
खेल व संस्कृति: स्थानीय स्तर पर विशेषकर महिलाओं के लिए खेल सुविधाओं का विस्तार व ग्रामीण खेल मेलों का आयोजन। विश्वविद्यालयों समेत सभी सार्वजनिक स्थानों पर फूहड़ व असभ्य सांस्कृतिक आयोजन बंद हो और समानता पर आधारित स्वस्थ मानवीय सांस्कृतिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार।
शासन-प्रशासन: पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत बनाना एवम विकास योजनाओं को लागू करने में स्थानीय लोगों की भागेदारी सुनिश्चित कर जनतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ बनाना। पंचायतों, नगर परिषदों व नगर निगमों में महिला प्रतिनिधियों की भागेदारी बढ़ाना। प्रशासन को जनता के प्रति जबावदेह बनाना। चुनावों में बुनियादी सुधार करना। कर्मचारियों का स्थानांतरण मनमाने ढ़ंग से मुख्यमंत्री/मंत्री का विशेषाधिकार न हो कर सर्वस्वीकार्य न्यायसंगत स्थानांतरण नीति बनाई जाए और उसे कड़ाई से लागू किया जाए।
परमाणु संयत्र बारे: जाने-माने परमाणु विशेषज्ञों द्वारा प्रकट की गई सुरक्षा व पर्यावरण संबंधी गंभीर आशंकाओं का निराकरण किये बिना गोरखपुर परमाणु संयंत्र के निर्माण की दिशा में अगला कदम न उठाया जाए।
अपील
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माक्र्सवादी) की हरियाणा राज्य कमेटी प्रदेश की जनता के सामने यह संकल्प पेश करती है कि उपरोक्त मांगों व मुद्दों को हासिल करने हेतू वह निरंतर संघर्षरत रहेगी। हमारी पार्टी के तमाम कार्यकर्ता और नेतृत्वकारी साथी राजनीति को जनसेवा का माध्यम मानकर पूरे समर्पण से काम करते रहेंगे। उन्होंने कमेरे वर्गों और वंचित तबकों की हिमायत में अपनी जिंदगियां लगाई हैं। वे दहेज प्रथा, अंधविश्वास, रूढि़वाद, छुआछूत, जातीय व लिंगभेद से समाज को मुक्त करवाने के लिए इस शोषणकारी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था को बदलने के प्रति वचनबद्ध हैं। हमारे साथी कठिन से कठिन परिस्थितियों में सादगी, ईमानदारी, मेहनत और निष्ठा से काम करते हैं।
हमारी पार्टी ने जिन उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा किया है वे सभी साथी संघर्षशील और कर्मठ हैं जिन्होंने हमेशा किसान, मजदूरों, छात्र, युवाओं, महिलाओं, वेतन भोगी तबकों के संगठनों के मंचों से लड़ाइयों का नेतृत्व किया है।
अनुभव ने दिखाया है कि मेहनतकश जनता की राजनीति करने वाले प्रतिनिधि ही विधानसभा में जाकर उनके हक में आवाज उठा सकते हैं। शासक वर्गों की पार्टियों के दलबदलू और स्वार्थ की राजनीति करने वाले लोगों ने राजनीति को व्यापार जैसा धंधा बना डाला है। वे इसमें काला धन निवेश करते हैं और फिर जनता के हितों की बलि चढ़ाकर धन्ना सेठों और कम्पनियों के लिए काम करते देखे जाते हैं। छल-कपट, फ रेब, लूट, झूठ और फूट की राजनीति करने वाले वर्गों ने चुनाव की राजनीति को अपने कब्जे में ले रखा है। वे आम जनता के हकों पर कुंडली मारे बैठे हैं। जनता को अपने हक हासिल करने के लिए राजनीति के क्षेत्र को आजाद करवाना होगा। आपस में मिलकर साहस जुटाने से यह लड़ाई जीती जा सकती है और यह हमें जीतनी होगी। आओ संकल्प लें कि जात-पात और धर्म सम्प्रदाय के झूठे नारों में नहीं बटेंगे और माकपा उम्मीदवारों के चुनाव निशान दराती, हथौड़ा और सितारा के सामने वाला बटन दबाकर अपनी रोजी-रोटी और सामाजिक न्याय की आवाज की गूंज विधानसभा तक पहुंचाएंगे।
हम प्रदेश की जनता से अपील करते हैं कि सी पी आई (एम) एवं वामपंथी पार्टियों को अपना वोट देकर कामयाब बनाएं।
कांग्रेस को हटाओ, भाजपा को हराओ।
मौकापरस्तों-फूटपरस्तों को नकारो
माकपा-वामपंथ को विधानसभा भेजो
मेहनतकशों के असली हिमायती वामपंथी उम्मीदवारों को विधानसभा में भेजो
मौकापरस्त, फूटपरस्त और लुटेरी राजनीति
का शिकंजा तोड़ो
राजनीति की तस्वीर बदलो।
कमेरे की तकदीर बदलो।।
राजनीति के मायने बदलो।
नेता-नीति दोनों बदलो।।
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