आखिर किस कीमत पर
हम में से एक हिस्से की कुछ ऐसी मानसिकता बनती जा रही है
कि मुझे आज जीना है पूरे ऐशो आराम के साथ चाहे इसके वास्ते
अपनी नैतिकता गिरवी रखनी पड़े , चोरी या हत्या करनी पड़े ,
हम में से एक हिस्से की कुछ ऐसी मानसिकता बनती जा रही है
कि मुझे आज जीना है पूरे ऐशो आराम के साथ चाहे इसके वास्ते
अपनी नैतिकता गिरवी रखनी पड़े , चोरी या हत्या करनी पड़े ,
माँबाप भाई बहन की सुपारी देनी पड़े ,
झूठ बोलना पड़े , घोटाले में हिस्सेदार होना पड़े
या देश बिदेशी कंपनी को गिरवी रखना पड़े,
वातावरण का प्रदूषण किसी भी हद तक करना पड़े ,
वातावरण का प्रदूषण किसी भी हद तक करना पड़े ,
मिलावट किसी हद तक करनी पड़े
इस सच्चाई को ढंकने के लिए लच्छेदार जुमले
घड़ना भी खूब आता है
घड़ना भी खूब आता है
जैसे राष्ट्र प्रेम , भारत महान आदि आदि ।
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