शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

आखिर किस कीमत पर

आखिर किस कीमत पर
हम में से एक हिस्से की कुछ ऐसी मानसिकता बनती जा रही है
कि मुझे आज जीना है पूरे ऐशो आराम के साथ चाहे  इसके वास्ते
अपनी नैतिकता गिरवी रखनी पड़े , चोरी या हत्या करनी पड़े , 
माँबाप भाई बहन की सुपारी देनी पड़े ,
 झूठ बोलना पड़े , घोटाले में हिस्सेदार होना पड़े
 या देश बिदेशी कंपनी को गिरवी रखना पड़े,
वातावरण का प्रदूषण किसी भी हद तक करना पड़े , 
मिलावट किसी हद तक करनी पड़े  
 इस सच्चाई को ढंकने के लिए लच्छेदार जुमले
 घड़ना भी खूब आता है 
जैसे राष्ट्र प्रेम , भारत महान आदि आदि ।







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